Saturday, 27 March 2010

सियासत में दौरे मनमानी..या मनमानी का दौरा??


बड़ा अजीब है ये सब कुछ जो हो रहा है यहाँ? यहाँ मतलब देश के सियासी दड़बे में जो कुछ हो रहा है उसकी बात कर रहा हूँ दड़बा कहना ही ज्यादा उचित लगा क्यूंकि इससे ज्यादा का हकदार ही नही है आजकल के सियासी किस्सों का मंच..जमकर मनमर्ज़ी हो रही है कहने को जनता की नुमाईंदगी करनी है इन्हें लेकिन अपने ही अफ़सानो से ही फ़ुरसत नही है तो "जनता मेरी जान" को जानने की क्या ज़रूरत? दरअसल political bankruptcy अब बचपना छोड़ जवानी की चौखट पे तांडव कर रही है एक तरफ मायावती को "मालावती" बनने से परहेज़ नही है तो वहीँ सपा के शेर मुलायम सिंह यादव को महिलाओं पे की गयी अपनी सोची-समझी टिप्पणी पे गुमान है ऐसा नही है कि हमारे सियासत के शाहजहाँ ऐसा सूरमाओं वाला कारनामा पहले नही करते थे..लेकिन तब में और फ़िलहाल में फर्क बस इतना है कि पहले ये सब कभी-कभी लीप ईयर जैसा होता था और आजकल हमारे ये शाहजहाँ ताजमहल बनवाने से भी ज्यादा खासुसियत वाला शग़ल रोजाना करना पसंद करते हैं अब ये आप तय कीजिए कि हमारे ये सियासत के सूरमा दौरे मनमानी में हैं या फिर इन्हें मनमानी का दौरा चढ़ा है?

Thursday, 25 March 2010

पानी होने वाली है पीड़ा !!


सभ्यता का संसार वहां बसता है जहाँ पानी को घर मिले..जैसे कहते हैं कि लक्ष्मी उसी घर को लक्ष्य करती है जहाँ सफाई होती है वैसे ही पानी वहीँ का पनघट बनता है जहाँ इसके कद्रदान हों पानी संस्कृति है..पानी संस्कार है लेकिन इन सबसे ऊपर और अहम..पानी जीवन है, लेकिन जीवन हमेशा जीता रहे ये ज़रूरी तो नही?? पानी की अहमियत काफी लम्बे वक़्त से बताई जा रही है परन्तु समझ कोई नही रहा यही वजह है की पानी की परेशानी जब लोग समझना ही नही चाहते थे तो आने वाले समय में इन्सान की इस बड़ी प्यास को बुझाने के लिए चाँद की छाती से भी पानी फूट पड़े इसकी अफ़रा-तफ़री का शोर सबको सुनाई पड़ा..पानी को पाने की इस आपा-धापी में किसी को ये नही सूझ रहा है कि एक दिन चाँद क्या, अगर तारों का भी पानी निचोड़ लिया जाये तो भी वो ख़त्म होगा ज़रूर! क्यूंकि संचय बिना कुछ भी बच जाये ये उम्मीद बेबुनियाद है..इसलिए पानी के इस्तेमाल में कमी और इसका संचय ही एकमात्र विकल्प है इस अमृत को बचाने का.."वस्ल(मीटिंग) भी तो हो चुका..रूख पे रही तब भी नकाब"..मतलब साफ़ है कि पानी पर बहस की नही बेक़रारी की दरकार है..पानी आँखों में भरी शराब भी है जो छलकती सिर्फ खास मौकों पर ही है..और मेरा कहना यही है के जब आंखों का पानी बेवजह ज़ाया नही होता तो फिर ज़िद इस बात की होनी चाहिए कि हमारी ज़रूरत का जल भी कम से कम ज़ाया तो ना ही हो..क्यूंकि अगर पानी की पीड़ा आज हम नही समझेंगे तो फिर चैन से सो जाईए और ख़ुद को इस बात के लिए तैयार कर लीजिये आने वाले वक़्त में पानी पीड़ा देने वाला है........

Saturday, 20 March 2010

पत्रकारिता को एन्जॉय करने की ज़रूरत..


इधर अपने पेशे के बारे में लिखने का ही दिल कर रहा है..कोई खास वजह नही है, सिर्फ अपना नज़रिया इस क़रीब-क़रीब सच्ची दुनिया के बारे में ज़ाहिर करने का शौक चढ़ा है..मै एक प्रतिष्ठित मीडिया समूह का हिस्सा हूँ, ज़्यादा नही अभी केवल एक साल ही बिताये हैं ख़बरों के खेत में..बज़ाहिर है कि ख़बरों कि फसल का सही-सही अनुमान नही है मुझे..और ना ही इस बात से वाकिफ़ हूँ कि इस खेत में जो फ़सल लगी हुई है उन्हें बचाने के लिए पेस्टीसाइड रुपी जो अलग-अलग ट्रीटमेंट दिया जा रहा है इन ख़बरों को वो कहाँ तक जायज़ है?? हाँ लेकिन इतना ज़रूर समझ में आने लगा है कि हम जर्नलिज्म को एन्जॉय नही कर रहे हैं..मेरी नज़र में सभी पेशों से अलग पत्रकारिता असल मायने में करियर है, क्यूंकि यहाँ हमेशा आपको खुद की योग्यता के पैमाने को कायम रखने के साथ ही हरपल इसका स्टैण्डर्ड बढ़ाना भी पड़ता है..बदलते वक़्त के साथ जैसे हर चीज़ बदल रही है वैसे में पत्रकारिता ना बदले ऐसा सोचना सरासर बेईमानी है..लेकिन पता नही क्यूँ इस बदलाव से मुझे कोफ़्त होने लगी है..वजह पत्रकारिता की रफ़्तार है..अगर इसका मिज़ाज ऐसा होता तो मुझे ये कोफ़्त नही होती..दरअसल तेज़ी पर होती मेरी ये तक़लीफ़ इसकी बेक़ाबू रफ़्तार पर है..इस रफ़्तार ने कलम के सिपाही को पहरेदार से चौकीदार बना दिया है..जागते रहो या सुनो-सुनो की बानगी पेश करते हुए वो खबरों को सिर्फ और सिर्फ जल्दी पेश करने की फिराक में है...ऐसे में किस ओर जा रही है राह..आप भी चिंतन कीजिये.....

Thursday, 18 March 2010

ख़बरों की रेस में अपनी ही ख़बर नहीं...


खींचो न कमानों को, न तलवार निकालो...जब तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो..अकबर 'इलाहाबादी ' की ये पंक्तियाँ पत्रकारिता की उस शक्ति का एहसास कराती हैं जिसमे ज़िम्मेदारी की भी सशक्त मौजूदगी हमेशा से रही है। शायद सिद्धांतों, आत्मसम्मान और इन सबसे ऊपर लोगों के सरोकारों के लिए पत्रकारिता जानी जाती है, आप सोच रहे होंगे की "शायद" जैसा संदेह वाला शब्द लिखकर मै पत्रकारिता की आत्मा पर शक़ कर रहा हूँ। दरअसल मै ऐसा ही करने की हिमाकत कर रहा हूँ ये सच है, क्यूंकि आज ख़बरों की तस्वीर और तक़दीर दोनों का जजमेंट कुछ मिनटों में हो जाता है। कभी सीमित रिसोर्सेस में भी ख़बरों की तह तक जाना पत्रकार अपना कर्त्तव्य समझताथा..वो किसानो और कॉमन मैन की ताक़त था..यही नही प्रतिष्ठा की आड़ में खोखली जड़ों वाले समाज के धन्नासेठों और हाकिमो की ख़बर भी वो बेपरवाह होकर लेता था, लेकिन केवल सच और पारदर्शिता का दामन थामे रहने वाली पत्रकारिता अब ख़ुद आधी सच्ची-आधी झूठी हो गयी है..अश्वत्थामा मारा गया की तर्ज पर लोगों को भ्रम में रखना अब इसकी फितरत हो गयी है। आज की पत्रकारिता की हक़ीक़त ये भी है कि वो व्यावसायिकता की ज़मीन पर अपने आयाम खोज रही है और इन सब का मकसद सिर्फ इस बेशर्म नंगी दौड़ में,ख़ुद को विजेता जानकर हर रोज़ समाचारों के इस वेश्या बाज़ार में फरेबी ख़बरों से लोगों के बिस्तर गर्म करना है।

Wednesday, 17 March 2010

आज का मीडिया:मूल्यों को सहेजने की दरकार


भारतीय लोकतंत्र के स्थाई स्तंभ न्यायपालिका, विधायिका, कार्यपालिका के बदलते स्वरूप से आज लोकतांत्रिक मूल्यों में दिन पर दिन गिरावट आती जा रही है, जिससे पूरा देश गंभीर संकट के बीच उलझता जा रहा है। पत्रकारिता इसी लोकतंत्र का चौथा स्थाई स्तंभ है। जिसकी सजग भूमिका इस बदलते परिवेश की पृष्ठभूमि को सकारात्मक दिशा की ओर मोड़ सकती है। ऐसे समय में मीडिया जो पत्रकारिता की महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि है, के समक्ष गंभीर चुनौतियों का खड़ा होना स्वाभाविक है तथा उसकी कार्य प्रणाली पर निर्भर है इसका भविष्य। इतिहास साक्षी है। देश पर जब-जब भी गंभीर संकट आया है, पत्रकारिता की सजग पृष्ठभूमि ने ही सही दिशा में मार्ग प्रशस्त कर समूचे देकश को जागृत किया है। इसके आलोक में दुश्मनों को पहचानने एवं उससे लड़ने की उर्जा सदैव मिलती रही है। इसी कारण आज तक इस स्तंभ की साख पूरे देश ही नहीं, विश्व स्तर पर सर्वोच्च बनी हुई है। पूरा तंत्र इससे भयभीत रहता है। तथा इसकी सजग निगाहों के समक्ष खडे होने की किसी में भी गलत तरीके से हिम्मत नहीं होती।

देश में बढ़ता आतंकवाद, भ्रष्टाचार, लूटपाट अनैतिक गतिविधिंयों की भरमार इस बदलते परिवेश की देन हैं। जहां न्यायपालिका भी जब स्वतंत्र पृष्ठभूमि नहीं बना पा रही है। विधायिका क्षेत्र में बढ़ते अनैतिक कदम लोकतंत्र के वास्तविक स्वरूप को ही बदलते जा रहे है। जहां देश का बुध्दिजीवी वर्ग कुंठित हो चला है। यह स्थिति निश्चित रूप से सभी के लिए घातक है। ऐसे परिवेश में जहां विधायिका हर प्रकार से लोकतंत्र के सजग स्तंभों पर हावी होती जा रही है, पत्रकारिता को इस दूषित वातावरण से अपने आपको अलग खड़ा कर अपनी पहचान बनानी होगी, तभी 21वीं सदी में पत्रकारिता का भविष्य सुरक्षित हो पायेगा। आज अर्थयुग का परिवेश चारों तरफ हावी नजर आ रहा है। इस परिवेश के बीच अपने वास्तविक स्वरूप को खड़ा करना एवं उजागर कर पाना मीडिया के समक्ष गंभीर चुनौतिया है, जिसे लीलने को विधायिका तैयार बैठी है। आज समूचा देश फिर से लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पत्रकारिता की ओर आत्मविश्वास के साथ आत्मरक्षा कवच पाने की लालस देख रहा है। जहां इस भ्रष्ट होती जा रही व्यवस्था को दूर करने का मार्ग प्रशस्त हो सके। यह आजादी पाने की दिशा मे नई जग की शुरूआत मानी जाएगी। जहां मीडिया को आज तड़क-भड़क आर्थिक युग की पृष्ठभूमि में अपनी पहचान बनाये रखनी होगी। यही 21वीं सदी की मीडिया के समक्ष गंभीर चुनौतियां है। तथा इसकी सफलता में उसका भविष्य सुरक्षित है।

Tuesday, 16 March 2010

ख़ुद की सोचते युवाओं की ख़ुदकुशी???


लौटने की ज़िद बेहद ज़रूरी शर्त है, उस दरम्यान जब परिवार की मसरूफ़ियत कुछ दर्द साझा करने का मौका ही नही देती..ये सूरते-हाल हमारे आस-पास या शायद हमारे ही घर का हो जिसे जानकर भी अनजान बनने में हम अपने नौनिहालों की भलाई समझ रहे हों तो गफ़लत की इस बेबुनियाद दीवार को शायद गिरा देना ही बेह्तर विकल्प है.. जगजीत सिंह की ग़ज़ल की चंद लाईने हैं.."पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है, अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम हैं"..व्यावहारिकता के तराजू पर तौल कर देखिये, कुछ यही दर्द आपके उस बच्चे के दिल में भी सुबक-सुबक कर रो रहा मिलेगा आपको,जिसपे उम्मीदों और अपेक्षाओं का बोझ तो डाल दिया है आपने लेकिन इस बोझ से झुकती हुई पीठ की पीड़ा आप समझना ही नही चाहते..या यूँ कहें कि आप डरते हैं कि अगर इस कराह को थोड़ा क़रार देने की जुर्रत आपने कर दी तो उन सारी उम्मीदों के हिमालय क्या होगा जो उन कन्धों पर ड़ाल दिया गया है जो अभी बोझ को संभालना भी नही सीखे हैं..युवावस्था ऐसी डगर है जो भटकने और सवंरने दोनों का समान अवसर देती है..लेकिन आज के युवा के जल्दी आत्मनिर्भर बनने की महत्वाकांक्षा उसे सवंरने के मौके कम जबकि भटकने के मौके ज्यादा देती है...ख्वाहिशों के आसमान में केवल ख़ुद की सोचते युवाओं की ये महत्वाकांक्षा तब खतरनाक हो जाती है जब ये दायरे लांघने लगती हैं..आगे बढ़ने के कई असफल प्रयास उसे तोड़ देते हैं..क्यूंकि वो अपनी योग्यता और क्षमता दोनों का उल्लंघन करने को बेचैन रहता है..आस-पास की प्रतिस्पर्धा उसे कुछ सोचने का वक़्त ही नही देती...ऊपर से माँ-बाप के सपने जो शायद जायज़ हैं लेकिन फिर भी कहीं ना कहीं अपने बच्चे के लिए नाजायज़ दबाव की शक्ल अख्तियार कर लेते हैं और तब सपनो, ख्वाहिशों का पीछे छूटना लाज़मी है..यहाँ गलती इस युवा से कदम-कदम पर होती है..वो परिवार से कुछ नही कह पता क्यूंकि वो शायद विरोध होगा...माँ-बाप से सगा रिश्ता इस दुनिया में नही है इसलिए बाकी उसकी क्या मदद करेंगे ये भी वो जानता है...ये अन्तर्द्वन्द्व ही उसे ख़ुदकुशी का रास्ता चुनने की बात सुझाता है...सारे सपने टूट जाते हैं..सिवाय संताप और शोक के कुछ बाकी नहीं रह जाता...इसलिए दोषी कौन है इसपे बहस से अच्छा है अपने बच्चे को जानिए...और बच्चों को ज़रूरत है परिवार की एहमियत समझने की...

Wednesday, 10 March 2010

वीमेन रिज़र्वेशन बिल:मंज़िल मुश्किल तो क्या..


आख़िरकार १४ सालों का इंतज़ार ख़त्म हुआ..देश की आधी आबादी के हक़ में फ़ैसले की आहट ज़रा देर से ज़रूर सुनाई दी लेकिन इसकी दुरुस्त आमद ने ये पैग़ाम दिया कि महिला आरक्षण बिल की नियति हमेशा पेश होना ही नहीं है बल्कि पारित होना भी इसकी किस्मत का हिस्सा है...हालांकि राज्यसभा में पेश होने के बाद भी इसकी आगे कि राह आसान नही रहने वाली लेकिन अब महिला आरक्षण की बात में क़दम पीछे होंगे इसकी आशा भी नही की जा सकती क्यूंकि इस बिल को लेकर ऐसा पहली बार हुआ जब दक्षिणपंथ और वामपंथ दोनों के समर्थन की आवाज़ बुलंद रही...और शायद यही कारण था कि सात सांसद जो कि इस बात पे उतारू थे के इस बिल को किसी भी हालत में पास ना होने दिया जाये उनके उपद्रवी और शर्मशार कर देने वाले विरोध के बावजूद ये बिल राज्यसभा की दहलीज़ को पार कर गया...सरकार की मंशा इस बिल को लेकर कितनी साफ़ है ये धुंधली तस्वीर तब अस्तित्व में आएगी जब लोकसभा में इस बिल को लेकर एक बार फिर शोर-शराबा होगा..ऐसे में अगर मौजूदा सरकार को नए सियासी दोस्त खुद की ख़ातिर बनाने पड़े तो ताज्जुब मत करियेगा...बहरहाल ख्वाहिश तो यही है की महिलाओं को आरक्षण की सौगात का अब ज्यादा वक़्त तक इंतज़ार ना करना पड़े...

Thursday, 4 March 2010

इंसान के सपनो के नीयत की दुनिया...


१९५७ में लेजेंड्रीं फिल्ममेकर गुरुदत्त ने एक फिल्म बनाई "प्यासा"...फिल्म नहीं चली क्यूंकि न तो भारतीय दर्शकों और ना ही भारतीय सिनेमा को आदत थी इतनी सच्ची फिल्म को पचाने की..इस फिल्म का ज़िक्र मैंने यहाँ इसलिए किया क्यूंकि जिस विषय की मैं यहाँ बात करने जा रहा हूँ उसका शीर्षक मैंने इसी फिल्म के बेहद ऑनेस्ट गीत से प्रेरित हो कर रखा है...गीत है..."ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है"....आज हम खुद की ख्वाहिशों में इतने उलझ गए हैं की सिर्फ और सिर्फ और सिर्फ अपने सतरंगी ख्वाबों को ही दखल देने की इजाज़त देते हैं...वजह हमारा आस-पास से वो अलगाव है जिसे हम जुड़ाव की ज़मीन देने से हिचकते हैं..ये कटाव इसलिए भी है क्यूंकि किसी के लिए कुछ करने का जोखिम उठाने की हिम्मत हम नहीं सकते और अगर कहीं से ये जज़्बा हमारे अन्दर पनप भी गया तो मौका आने पर हम अपने परोपकार को जताने से भी नहीं चूकेंगे...क्यूंकि ये हमारी फ़ितरत में शामिल है साहब..लेकिन अगर सपनो की नीयत सच्ची हो तो यक़ीन मानिये कुछ लोग ऐसी नेक नीयत लिए ऐसे भी मिलेंगे जो खुद बिना किसी शोर-शराबे के ऐसी कोई राह दिखा देते हैं जिन्हें हम हमेशा कठिन समझ कर या तो उस राह पर जाने से कतराते हैं या फिर पहल कैसे की जाये इस उधेड़बुन में उलझे रहते हैं...मुझे भी कुछ ऐसे ही दोस्त मिले इस अजनबी शहर हैदराबाद में...जिन्होंने होली से ठीक एक दिन पहले यानि की २८ फरवरी को मानसिक रूप से कमज़ोर बच्चों की देखभाल करने वाली एक संस्था में अपने दोस्त का जन्मदिन मनाया..यहाँ बताना ज़रूरी है की मेरे ये सारे नेकदिल दोस्त ऐसे घरों से ताल्लुक़ रखते हैं जहाँ इन्हें कोई तक़लीफ़ नहीं है और मुझे इस बात का पूरा भरोसा है की ना ही इनसे कभी ये कहा गया होगा की बच्चो जाओ और समाज के दुःख-दर्द दूर करो..लेकिन इन्होने वो सब कुछ किया जिन पर इनके माँ-बाप के साथ मुझे भी फ़क्र है..ये बच्चों के साथ खाए, खेले और उनके क़रीब रहकर उनका हर वो एहसास साझा किया जो उस संस्था ने अब तक के अपने सफ़र में कहीं नहीं पाया...संस्था की निदेशिका शांति वेंकट से जब मैंने बात की तो उनका कहना था के उनकी ज़िन्दगी का मक़सद इन बच्चों की सेवा करना है...और वो खुद हैरान थी के जो बच्चे अपने घरों में ज़मीन में कभी बैठते तक नहीं होंगे और जिन्हें धूल-मिट्टी से हमेशा बचाया गया होगा वो बच्चे आज इन "स्पेशल बच्चों" की ख़ातिरदारी में अपने ज़िन्दगी जीने की अदा भूल गए थे...राज, छोटी बाबु, स्नेह और ममता ये मेरे उन दोस्तों के नाम हैं जिन्होंने मुझे बहूत कुछ सिखाया है..इसके अलावा भी कार्तिक, रेनू और राज के उन सभी दोस्तों का मै शुक्रगुज़ार हूँ जिन्होंने इस नेक काम में अपनी मौजूदगी से बच्चों के चेहरों पर मुस्कान ला दी..अपने ब्लॉग में मैंने अब तक थोड़ा बहुत जो कुछ भी लिखा है उसका इरादा हमेशा अपनी खबरों की समझ और सोच को ही आयाम देना रहा है..लेकिन ये पहली बार है जब मै कुछ ऐसा अनुभव बाँट रहा हूँ जिसने जिंदगी को देखने-समझने के मेरे नज़रिये को ही बदल रख दिया है...मुझे अब ज़िन्दगी का उद्देश्य बदलने की ज़रूरत महसूस हुई है..मै ये नहीं जानता की जो कुछ सोचा है वो सब मूर्त रूप ले पायेगा के नही लेकिन मै इस बात से वाकिफ़ हूँ कि मै अपने अब तक के सफ़र में इतना परेशाँ हाल कभी नहीं रहा...खैर खुद से कुछ वादे किये हैं और उम्मीद भी कायम है के मेरे वादों के जाल में मेरी वो नयी दुनिया जिसका ख्वाब अब मुझे जागते-सोते आने लगा है...उसमे वो सब कुछ समा जायेगा जिससे मै अपने आपको संतुष्ट कर सकूँ...मेरे ब्लॉग की दुनिया के मित्रों..उम्मीद रहेगी के आप सब, मेरी और मेरे इन नेक नीयत के दोस्तों की हौसलाअफजाई ज़रूर करेंगे...

Wednesday, 3 March 2010

भाजपा...तुझको चलना होगा...


ज़िन्दगी कैसी है पहेली हाय...कभी तो हंसाए..कभी ये रुलाए..आनन्द फिल्म का ये गीत कुछ ख़ास मौकों पर हम गाते हैं या निराशा मे आशा का बीजारोपण भी इस गीत के माध्यम से करने की कोशिश की जाती है..शायद इन्ही सब वजहों से भाजपा के नये-नवेले उत्साही अध्यक्ष नितिन गडकरी ये गीत गाकर भाजपा की भुजाओं को एक बार फिर से मज़बूत करने जुटे हैं...ख़ास बात ये भी रही कि गीत की उत्साहवर्धक गोली मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के शिवराज सिंह चौहान ने भी मन्ना डे के ‍‍‌‌‌"नदिया चले..चले ये धारा" गीत के ज़रिये भाजपा के तमाम उपस्थित नेताओं और कार्यकर्ताओं को खिलाई..कुछ सपने साथ लिए और आत्मविश्वास से लबरेज़ गडकरी की बातें कहीं कहीं सटीक और ईमानदार लगती हैं...अपने संबोधन की शुरुआत ही वो जनसंघ की बातों से करते हैं जो भाजपा के पिछले किसी अधिवेशन में शामिल नहीं रही..श्यामा प्रसाद मुखर्जी से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक..गडकरी के भाषण में वो सभी शख्सियतें शुमार थीं जिनसे प्रेरणा लेने की बातें बड़ी शिद्दत से महसूस तो की जा रही थी लेकिन कोई ये समझ नहीं पा रहा था कि आखिर ये सब किया कैसे जाय..आज एनडीप्रमुख विपक्षी दल है किन्तु काफी लम्बे वक़्त से पार्टी अपने इस दायित्व से ना चाहते हुए भी पीछे हट रही थी..आतंरिक असंतोष और लगातार पनप रहे विवादों ने पार्टी को हार के बाद के अनिवार्य आत्ममंथन की इजाज़त ही नहीं दी..लेकिन इन सबके बीच बीजेपी के अन्दर के लोकतंत्र ने जिसके लिए पार्टी हमेशा से पहचानी जाती रही है, परिवर्तन की ख्वाहिश पैदा की..और अपेक्षाकृत कम उम्र के युवा नेतृत्व को भाजपा का हिसाब-क़िताब दुरूस्त करने की जिम्मेदारी मिली..अब देखना है की आगे की जो चुनौती भरी राह जो गीतों और नितिन गडकरी की जोशीली किन्तु प्रेक्टिकल बातों ने दिखाई है उस पर ये कमल के सिपाही चलने का साहस जुटा पाते हैं या नहीं....

सरकने का ये दौर..सिसकियों का ये ज़माना..

AI generated Image from ChatGPT सरकने का ये दौर..सिसकियों का ये ज़माना.. बुझा हुआ आसमां..कच्ची दीवारों का अफ़साना.. ठोकरों से भरी राहें...रास्...