Wednesday, 10 March 2010

वीमेन रिज़र्वेशन बिल:मंज़िल मुश्किल तो क्या..


आख़िरकार १४ सालों का इंतज़ार ख़त्म हुआ..देश की आधी आबादी के हक़ में फ़ैसले की आहट ज़रा देर से ज़रूर सुनाई दी लेकिन इसकी दुरुस्त आमद ने ये पैग़ाम दिया कि महिला आरक्षण बिल की नियति हमेशा पेश होना ही नहीं है बल्कि पारित होना भी इसकी किस्मत का हिस्सा है...हालांकि राज्यसभा में पेश होने के बाद भी इसकी आगे कि राह आसान नही रहने वाली लेकिन अब महिला आरक्षण की बात में क़दम पीछे होंगे इसकी आशा भी नही की जा सकती क्यूंकि इस बिल को लेकर ऐसा पहली बार हुआ जब दक्षिणपंथ और वामपंथ दोनों के समर्थन की आवाज़ बुलंद रही...और शायद यही कारण था कि सात सांसद जो कि इस बात पे उतारू थे के इस बिल को किसी भी हालत में पास ना होने दिया जाये उनके उपद्रवी और शर्मशार कर देने वाले विरोध के बावजूद ये बिल राज्यसभा की दहलीज़ को पार कर गया...सरकार की मंशा इस बिल को लेकर कितनी साफ़ है ये धुंधली तस्वीर तब अस्तित्व में आएगी जब लोकसभा में इस बिल को लेकर एक बार फिर शोर-शराबा होगा..ऐसे में अगर मौजूदा सरकार को नए सियासी दोस्त खुद की ख़ातिर बनाने पड़े तो ताज्जुब मत करियेगा...बहरहाल ख्वाहिश तो यही है की महिलाओं को आरक्षण की सौगात का अब ज्यादा वक़्त तक इंतज़ार ना करना पड़े...

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