Thursday, 25 March 2010

पानी होने वाली है पीड़ा !!


सभ्यता का संसार वहां बसता है जहाँ पानी को घर मिले..जैसे कहते हैं कि लक्ष्मी उसी घर को लक्ष्य करती है जहाँ सफाई होती है वैसे ही पानी वहीँ का पनघट बनता है जहाँ इसके कद्रदान हों पानी संस्कृति है..पानी संस्कार है लेकिन इन सबसे ऊपर और अहम..पानी जीवन है, लेकिन जीवन हमेशा जीता रहे ये ज़रूरी तो नही?? पानी की अहमियत काफी लम्बे वक़्त से बताई जा रही है परन्तु समझ कोई नही रहा यही वजह है की पानी की परेशानी जब लोग समझना ही नही चाहते थे तो आने वाले समय में इन्सान की इस बड़ी प्यास को बुझाने के लिए चाँद की छाती से भी पानी फूट पड़े इसकी अफ़रा-तफ़री का शोर सबको सुनाई पड़ा..पानी को पाने की इस आपा-धापी में किसी को ये नही सूझ रहा है कि एक दिन चाँद क्या, अगर तारों का भी पानी निचोड़ लिया जाये तो भी वो ख़त्म होगा ज़रूर! क्यूंकि संचय बिना कुछ भी बच जाये ये उम्मीद बेबुनियाद है..इसलिए पानी के इस्तेमाल में कमी और इसका संचय ही एकमात्र विकल्प है इस अमृत को बचाने का.."वस्ल(मीटिंग) भी तो हो चुका..रूख पे रही तब भी नकाब"..मतलब साफ़ है कि पानी पर बहस की नही बेक़रारी की दरकार है..पानी आँखों में भरी शराब भी है जो छलकती सिर्फ खास मौकों पर ही है..और मेरा कहना यही है के जब आंखों का पानी बेवजह ज़ाया नही होता तो फिर ज़िद इस बात की होनी चाहिए कि हमारी ज़रूरत का जल भी कम से कम ज़ाया तो ना ही हो..क्यूंकि अगर पानी की पीड़ा आज हम नही समझेंगे तो फिर चैन से सो जाईए और ख़ुद को इस बात के लिए तैयार कर लीजिये आने वाले वक़्त में पानी पीड़ा देने वाला है........

1 comment:

  1. पानी बचाने के लिए सार्थक प्रयास करने होंगे.


    --

    हिन्दी में विशिष्ट लेखन का आपका योगदान सराहनीय है. आपको साधुवाद!!

    लेखन के साथ साथ प्रतिभा प्रोत्साहन हेतु टिप्पणी करना आपका कर्तव्य है एवं भाषा के प्रचार प्रसार हेतु अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें. यह एक निवेदन मात्र है.

    अनेक शुभकामनाएँ.

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