Thursday, 18 March 2010

ख़बरों की रेस में अपनी ही ख़बर नहीं...


खींचो न कमानों को, न तलवार निकालो...जब तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो..अकबर 'इलाहाबादी ' की ये पंक्तियाँ पत्रकारिता की उस शक्ति का एहसास कराती हैं जिसमे ज़िम्मेदारी की भी सशक्त मौजूदगी हमेशा से रही है। शायद सिद्धांतों, आत्मसम्मान और इन सबसे ऊपर लोगों के सरोकारों के लिए पत्रकारिता जानी जाती है, आप सोच रहे होंगे की "शायद" जैसा संदेह वाला शब्द लिखकर मै पत्रकारिता की आत्मा पर शक़ कर रहा हूँ। दरअसल मै ऐसा ही करने की हिमाकत कर रहा हूँ ये सच है, क्यूंकि आज ख़बरों की तस्वीर और तक़दीर दोनों का जजमेंट कुछ मिनटों में हो जाता है। कभी सीमित रिसोर्सेस में भी ख़बरों की तह तक जाना पत्रकार अपना कर्त्तव्य समझताथा..वो किसानो और कॉमन मैन की ताक़त था..यही नही प्रतिष्ठा की आड़ में खोखली जड़ों वाले समाज के धन्नासेठों और हाकिमो की ख़बर भी वो बेपरवाह होकर लेता था, लेकिन केवल सच और पारदर्शिता का दामन थामे रहने वाली पत्रकारिता अब ख़ुद आधी सच्ची-आधी झूठी हो गयी है..अश्वत्थामा मारा गया की तर्ज पर लोगों को भ्रम में रखना अब इसकी फितरत हो गयी है। आज की पत्रकारिता की हक़ीक़त ये भी है कि वो व्यावसायिकता की ज़मीन पर अपने आयाम खोज रही है और इन सब का मकसद सिर्फ इस बेशर्म नंगी दौड़ में,ख़ुद को विजेता जानकर हर रोज़ समाचारों के इस वेश्या बाज़ार में फरेबी ख़बरों से लोगों के बिस्तर गर्म करना है।

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