Saturday, 9 October 2010

ज़मीन पर जानलेवा जोर...


जो अपनी मिट्टी से रूठ कर चला जाता है, उसका इंतज़ार वो ज़मीं भी करती है लेकिन जब बहुत वक्त तक वो वापस नही आता तो उसकी धरती भी उससे ख़फ़ा हो जाती है। ये माटी की नाराज़गी नहीं बल्कि उसके सब्र की टूटी हुई आस की प्रतिक्रिया भर होती है। किसान ज़मीन का बेटा है और जब कभी भी एक मां को उसके लाडले से अलग होना पड़ेगा तो कराह तो आयेगी ही । ये अलग बात है कि इस कराह को सियासी शोर मे दबाने के भरसक जतन किये जा रहे हैं लेकिन ये बेटे अपनी मां का आंचल छोड़ने को तैयार नहीं। ऐसे में हमारे पॉलिटिकल प्लेयर्स को अब ये बात समझ लेनी चाहिये कि किसानों को माटी के नाम पर मोहरा बनाकर सियासत करना जोखिम भरा शॉट हो सकता है। किसान आंदोलन पहले भी होते थे॥आज भी हो रहें हैं, फ़र्क बस इतना है कि पहले किसानों की बातों का महत्व होता ही नही था और आजकल बात तो सुनी जाती है लेकिन उसके बाद सरकार से लेकर मीडिया और बुद्धजीवी वर्ग सभी ऐसे मूवमेंट को ग़लत बताने मे लगे रहते हैं। ये सो कॉल्ड सरोकारी लोग दलील देते हैं कि जब-जब भी किसान ऐसे आंदोलन करते हैं तो आम जनता की डेली लाईफ़ मे खलल पड़ता है..बिल्कुल पड़ता होगा साहब लेकिन क्या इन्होंने ये सोचने की ज़हमत उठाई कि आख़िर क्या मजबूरियां आन पड़ती हैं कि एक किसान कच्ची राहों को छोड़ फ़ोरलेन पर बदहवास होकर चीखता है? ऐसे कौन से हालात हैं जो इस बावले को गांव का निश्चिंत गगन भूलकर शहर के जंगल मे आने को विवश करते हैं? जवाब किसी ने ढूढने की कोशिश नही की, सिर्फ़ सवाल गढ़ते गये। किसान आंदोलन होते रहे है..आज भी होते हैं और आगे भी छिड़ते रहेंगे..ये तब भी होते थे जब जागीरदार और ज़मींदार इनकी आवाज़ को दबाने का काम करते थे..ये अब भी होते हैं जब पूंजीपती और सियासी सांप मिलकर इन्हें डंसने पर आमादा हैं और तय है कि ये आने वाले कल मे भी होंगे जब औद्योगीकरण की ये सहमी-सहमी सी हवा गांवो को भी अपने बिगड़ैल माहौल का आदि बनाने लगेगी।देश के हर कोने को खोज-खोज कर किसानों की ज़मीनों को नज़र लगायी जा रही है, अब ऐसे मे अगर किसान की प्रतिक्रिया तीख़ी हो तो ये बिल्कुल सही है। यहां बताना चाहुंगा कि मेरा जन्म कुशीनगर मे हुआ और यही मेरा गांव भी है। सच कहुं तो काफ़ी वक़्त गांव मे रहने के बावजू़द भी कभी किसानों की पीड़ा समझ मे नहीं आयी..और जब शहर मे पढ़ाई करने और ख़ुद की पहचान क़ायम करने आया तो भी गांव के सुकून को देखकर ही टीस बढ़ती। हमेशा लगता कि हम शहरिया लोगों से ज़्यादा सुखी गांव के लोग हैं, मुझे लगता है आप मे से भी अधिकतर लोग मेरी ही तरह राय रखते होंगे।दरअसल गांवों और किसानों के बारे में हमारी ऐसी सोच इसलिए है क्यूंकि हम शहरों की भागदौड़ भरी प्रतियोगिता के प्रतिभागी है और वाजिब है जब इस रेस की तुलना ग्रामीण इलाक़ो और किसानों की ज़िंदगी से करेंगे तो सुख-चैन वहां ज़्यादा दिखेगा जहां अफ़रा-तफ़री नहीं है लेकिन मंद गुज़र रही इनकी ज़िदगी मे कुछ ना सुख इनका अपना है और ना ही चैन। हम सभी अपने हक़ के लिए हल्ला मचाते हैं उसी तरह किसान भी सिर्फ अपने अधिकारों के लिए बोलते है हालांकि ये गौर करने वाली बात हैं कि जबतक ये आवाज़ शोर या दर्द भरी चिल्लाहट मे नही बदल जाती तबतक उन कानों मे कुलबुलाहट नहीं होती जो इस दर्द के ज़िम्मेदार होते हैं। सफल-असफल किसान आंदोलनों के बीच आप इनके दर्द भरे अफ़साने खबरिया चैनलों और समाचार पत्रों के पन्नों मे बुने हुए पाते भी हैं। मुझे लगता है किसान आदतन बिगड़ा हुआ है, सूखे के शैतान और बाढ़ के बवाल के बीच ये हमेशा कॉम्प्रॉमाईसिंग भूमिका मे रहा है। फसल हो या ना हो लगान तो देना ही पड़ेगा ये पुराने ज़माने के ज़मीदारों के बोलनचन होते थे, आजकल सीन थोड़ा चेंज है..फ़सल इतनी बटोर ली गई है कि गोदामों मे पड़े-पड़े सड़ रही है और बाक़ी का लगान ज़मीन पर ज़ोर लगाकर अपने हक़ मे करने मे लग रहा है। यक़ीन जानिए जो चींज़ें किसानों की नियति के दामन मे डाल दी जाती हैं उनमे कुछ बदलता नहीं है, वो सारा कुछ वक़्त की नाव पर सवार होकर बोझ बना चला आता है। आज़ादी के पहले से किसान आंदोलन होते आये हैं और जब कभी भी ऐसे विरोधों को सरकार को सामना करना पड़ा तो समाधान ढूंढने की बजाय इन्हें कुचल देना ज़्यादा ठीक समझा गया। इस विषय पर मेरी समझ भले ही नाकाफ़ी हो लेकिन इतना ज़रूर है कि पीड़ा को समझने मे किसी उम्र या अनुभव की दरकार नहीं होती। इस संजीदा विषय पर लिखने की ज़िम्मेदारी से मै भली-भांति वाक़िफ़ हूं और लिखने का मन इसलिए हुआ क्यूंकि जब टप्पल मे किसानों पर बर्बरता हुई तो उसका असर देश के बाक़ी ग्रामीण और आदिवासी इलाक़ों के साथ मेरी जन्मभूमि कुशीनगर मे भी दिखा। ज़मीन अधिग्रहण की चीत्कार भगवान बुद्ध की इस शांत धरा मे भी सुनाई पड़ी। बता दूं कि यहां भगवान बुद्ध के नाम की बैसाखी लेकर दो हजार पांच सौ करोड़ रूपए की मैत्रेय परियोजना( एक अंतर्राष्ट्रीय परियोजना) का खाका १९९० में खींचा गया। कुशीनगर जो कि उत्तर-प्रदेश का एक ज़िला है और इससे ज़्यादा इसकी पहचान इस रूप में है कि यहां महात्मा बुद्ध ने अपने जीवन की अंतिम घड़ियां बितायी थीं और यहीं इनकी मृत्यु भी हुई। प्रोजेक्ट के मुताबिक यहां ५०० फ़ीट उंची मैत्रेय बुद्धा की कांस्य प्रतिमा बननी है, साथ ही एजुकेशन और हैल्थ के नज़रिए से भी इस विशेष इलाक़े को आबाद करना इस परियोजना के हिस्से में आता है। साथ ही इस इंटरनेशनल प्रोजेक्ट के लगे हाथों कुशीनगर में अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के निर्माण को भी ज़मीनी हक़ीक़त देने की योजना है। ज़ाहिर है इतने बड़े पैमाने पर जब परियोजना का दायरा हो तो ज़मीन की आवश्यकता तो होगी ही और कुशीनगर का ज़्यादातर हिस्सा खेती के उपयोग मे आता है, वो खेती जो किसान करते हैं और जिनकी ये ज़मीनें होती हैं। हालांकि इस बीच ख़बरें ऐसी भी आयीं कि मायावती सरकार ने पूर्वांचल मे किसान आंदोलन को बढ़ने देने से रोकने के लिए इस ज़िले के कुछ गांवों के किसानों की ज़मीन वापस करने का फ़ैसला किया है। ये ज़मीने हवाई अड्डे के विस्तार की योजना से अलग करके किसानों को वापस करने का आदेश हो गया है। साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार ने कुशीनगर में प्रस्तावित विवादास्पद मैत्री परियोजना को रद्द करने का भी संकेत दिया है। इस परियोजना से पीड़ित सैकड़ों किसान पिछले कुछ सालों से लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। माया मैडम ने चाहे डर के मारे ये क़दम उठाया हो या फिर पश्चिम में अलीगढ़ और आगरा के किसानों के आन्दोलन से सहम कर या किसी और दबाव मे, मगर राहत इस बात की है कि जो किसान अपनी जान देकर भी ज़मीन ना देने की बात कह रहे थे उनकी जान की कीमत उन्हें समझ में आई। उत्तर प्रदेश में ही नहीं बल्कि देश की पूरी चौहद्दी मे किसान औद्योगीकरण और विकास के नाते अपनी जान गंवाने पर मजबूर किए जा रहे हैं। ये सारे औद्योगीकरण के हिमायती लोग किसानों के हक़ के साथ उनकी जान लेने की तैयारी मे हैं। विकास के पॉपुलर खांचे में किसानों की बलि एक इनवेस्टमेंट बन गया है। हांलाकि किसानों के हितैषी बनने का दम भरने वाले और ख़ुद को तथाकथित किसान नेता कहलवाने का आलाप करने वाले मौकापरस्त नेता भी सत्ता के शहरों मे जाकर गांव मे कॉर्पोरेट खेती की वक़ालत करने लगते हैं। सिंगूर हो या नंदीग्राम, टप्पल हो या विदर्भ, हर तरफ पूंजीवादी साम्राज्यवाद की आंच पर किसानों की जान और ज़मीन का लहू पक रहा है। ये उपभोक्तावादी सभ्यता के साहूकार इस बात को समझना ही नहीं चाहते कि किसान को ज़मीन के बदले पैसा नहीं ज़मीन ही चाहिए। पैसे देकर क्या भला होगा? पैसों के तो पांच पैर होते हैं, आज नहीं तो कल ख़र्च होंगे ही, ऐसे में लाखों छोटे गांवो और क़स्बे के इस देश के किसानों की ख़िलाफत को समझिए, वो घाटे की खेती मे भी कम से कम जी तो रहा है, इसलिए कृपा करके ज़मीन पर ये जानलेवा जो़र बंद कीजिए।

Monday, 28 June 2010

खा़मोशी ख़ुद अपनी ज़ुबाँ दे..हो सकता है?


भोपाल गैस कांड पर लगातार कुछ ना कुछ लिखा और बोला जा रहा है..मेरे ब्लॉग मित्रों को भी शायद ये शिकायत रही हो कि मैने क्यूं नहीं कोई विचार, आलोचना या फिर कटाक्ष किया इस भयानक औद्योगिक त्रासदी के परत-दर-परत खुलते घटनाक्रम पर? माफ़ी ज़रूर चाहुंगा मित्रों जो इतना कुछ देख-सुन और समझकर भी मैने अपने विचार जो ग़ुस्से की शक्ल लिए फड़फड़ा रहे थे, उन्हें पिंजरे मे क़ैद रखा।दरअसल..दुनिया की इस सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी पर अबतक कुछ ना अभिव्यक्त करने की वजह थी हर रोज़ नये नामों और ख़ुलासों का सामने आना, क्या सच है और क्या झूठ इस बात की कशमकश और इनसबसे अलग इस बात के ख़्याल से रूक जाना कि क्या राजीव गाँधी की कोई भूमिका वास्तव में हो सकती है? इन सारी बातों पर जिरह करने से पहले..इस त्रासदी मे ख़त्म हुई ज़िन्दगियों और उनके परिवारों के प्रति मेरी नाकाफ़ी संवेदना..साथ ही आज भी जीवन से युद्ध कर रहे प्रभावित लोगों के लिए भी मैं एक ईमानदार प्रार्थना करना चाहता हूं..और मौत की मेहरबानी लेकर आये उस एंडरसन के लिए घृणा भरा एक पैग़ाम देना चाहता हूं। मैं कहना चाहता हूं..सुन एंडरसन..ये सच है कि "गुनाह छुपाना आसान है क़त्ल की रात को..पर सवार फिर भी है मौत, ज़िन्दगी की दरो-दीवार को"..मतलब साफ है कि भगवान आज नही तो कल तेरा भी न्याय कर ही देंगे। लेकिन इन सबसे अलग जो व्यक्ति आजकल सवालों के घेरे मे है वो है अर्जुन सिंह..वो अर्जुन सिंह जो तत्कालीन मुख्यमंत्री थे और आज चुप हैं..अर्जुन सिंह चुप हैं या कराये गये हैं, ये भी सवाले-तलब है? ऐसा नहीं है कि अर्जुन सिंह ने कुछ कहा नहीं..लेकिन जो कुछ कहा वो समाचार पत्र के संपादक से कानाफूसी में जो आजतक साबितशुदा होने की बाट जोह रहा है। ख़ैर करवट लेकर और आंखें खोलकर सोये इस अर्जुन के मुंह खोलने का वक्त जब आये तब आये लेकिन सरकार के ज़बरदस्ती आंखें मींचकर बैठे रहने की अवस्था ने उसकी भी नीयत पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। दरअसल जबसे तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की भूमिका इस त्रासदी की ज़िम्मेदारियों के मद्देनज़र निकलकर सामने आने लगी हैं तभी से लाचारों वाली स्थिति देखने को मिल रही है। सत्ता और सत्ता के बाहर, हर तरफ शोर है कि आख़िर किसके मन मे खोट है? छोड़िए जनाब अर्जुन और राजीव के दामन को..ज़रा नज़र घुमाईये सियासत के इर्द-गिर्द के शोहरतपसंद शूरवीरों पर..एक दिग्गज हैं दिग्विजय सिंह जो परदेस मे गये तो है अपनी पत्नी का इलाज कराने लेकिन सर जी को पता है कि सात समंदर पार से ख़बरों मे कैसे रहा जाय..दिग्गी राजा वहीं से कह देते है कि हो सकता है कि सरकार की रज़ामंदी से एंडरसन को वापस भेजा गया हो..हालाँकि आग लगी तो दिग्गी राजा deny कर गये अपने बोलवचनों से।उधर तमाम ब्यूरोक्रैट्स जो हमेशा से सत्ता के इशारों पर नाचते रहे हैं अचानक से ज़मीर की बयाने-गुलामी करने लगते हैं..25 साल तक अपनी ज़ुबान को ज़हमत ना देने वाले ये नौकरशाह अब इतना बोल रहे हैं कि मानों इतने बरस अंदर से भरे बैठे थे? अंतरआत्मा की आवाज़ इन्हे इतने वर्षों मे कभी नही सुनाई दी, और साहब सुनाई भी कैसे देती जब ब्यूरोक्रेसी की परम्परा को पूरी शिद्दत के साथ निभाने की धुन सवार थी इनके दिलो-दिमाग पर। देर से जागी इनकी अंतरआत्मा भी उतनी ही दोषी है जितनी कि सरकार की तरफ से की गई अनदेखी..और जब हर ओर लोग सरकार को कोस रहे हो तो सरकार के लिए भी कान मे तेल डालकर सोने का अभिनय करना आसान नही था..सो अचानक PM सर एक्टिव हुए और त्रासदी के तमाम पहलुओं की जांच के लिए मंत्रीसमूह यानि GOM बना डाली..कहा दरबार मे दस दिन के अंदर रिपोर्ट पेश हो जानी चाहिए..वैसे इतनी लेटलतीफ़ी हो चुकी थी इस मामले मे कि अगर GOM तय वक्त से थोड़ा ज़्यादा समय लेती तो उसके ढीलेपन पर भी एक जांच कमेटी बनानी पड़ती..शुक्र है, ऐसा कुछ हुआ नही। रिपोर्ट मनमोहन सर को भेंट कर दी गई है..अब इसे साहस नही कहेंगे तो क्या कहेंगे कि इस पूरे दस्तावेज़ मे ख़ामोश अर्जुन को किसी भी प्रकार से बोलने पर विवश नही किया गया है..मुआवज़े का मरहम लगाकर सबकुछ भूल जाने की गुज़ारिश करती ये रिपोर्ट पीड़ा को पैसे से तोल रही है और ये सबकुछ जो हो रहा है वो बड़ी ही ख़ामोश मिज़ाजी से..लेकिन ये सारे बनावटी और खोखली दिलासा देने वाले सियासी खिलाड़ी ये नही जानते कि यही ख़ामोशी एक दिन अपनी ज़ुबाँ दे..ऐसा भी हो सकता है..So wait and watch nation....

Sunday, 27 June 2010

तेरे बिन...

दिन गुज़र रहे हैं तेरे बिन..

हाल भी ढल गया है तेरे बिन..

महसूस कुछ नही होता तेरे बिन..

पानी भी उँगलियों से फिसल गया तेरे बिन..

देवता हुआ जा रहा हूँ तेरे बिन...

पूजा हर ठहर जा रहा हूँ तेरे बिन..

रेशमी रातों की याद अब भी है तेरे बिन..

ख्यालों की बेवफाई की आज आस है तेरे बिन...

आख़िर सुकून होके भी नही है तेरे बिन..

Tuesday, 15 June 2010

नये वादों का बेहतर जाल..


ओबामा भारत आने का ऐलान कर चुके हैं। ये घोषणा क्रमवार ख़ास बातचीत के तमाम दौरों की वजह से भी बहुत कुछ कह रही है। ओबामा से पहले भारत के विदेश मंत्री एस.एम कृष्णा और उनकी अमेरीकी समकक्ष हिलेरी क्लिंटन के बीच का रणनीतिक डॉयलॉग हुआ, थोड़ा और पूर्व मे जायें तो भारत मे दोनो देशों के विदेश सचिवों की सचिव स्तरीय वार्ता भी हुई..हालांकि ये वर्ड एक्सचेंज, अमेरिका की तरफ से भारत और पाकिस्तान दोनो को अपने संबधों को सुधारने की नसीहत भर रह गया लेकिन महत्व इस बातचीत का भी है। दरअसल आतंकवादियों की फेवरेट जगह के मामले मे भारत भले ही नंबर वन पर हो लेकिन हाल ही मे टाईम स्क्वॉयर पर हुए नाकाम हमले ने अमेरिका को भी चौकन्ना कर दिया है। वो अमेरिका जो पाकिस्तान की जानबूझ कर की जा रही नादानियों को सिर्फ इसलिए नज़रअंदाज किये जा रहा था क्यूंकि उसे लगता था कि इसी बहाने वो आतंकवाद से भी बच जायेगा और विश्व शक्ति बनने की उसकी राह भी मुकम्मल हो जायेगी। लेकिन वो कहते हैं ना चोर चोरी से जाये मगर सीनाजोरी से ना जाय..और यही कारण है कि टाईम्स स्क्वॉयर हमले के बाद अमेरिका ने ये समझ लिया है कि पाकिस्तान अपनी फ़ितरत नही छोड़ सकता। भारत की एहमियत अमेरिका मानता और समझता रहा है लेकिन हमारी react ना करने के liberal रवैये से उसका मन भी बढ़ता रहा है। ख़ैर हमारा तौर-तरीका आज भी नही बदला है लेकिन इनसब के बावजूद बहुत कुछ अच्छे तौर पर परिवर्तन की राह पर तेज़ी से बढ़ रहा है। ओबामा का भारत आने की घोषणा करना और वो भी अमेरीकी विदेश विभाग के प्रोटोकॉल का उल्लंघन करके? सोचने वाली बात ये है कि ओबामा मौके के महत्व को लक्ष्य कर ये सब किया। ये बड़ी Rare स्थिति है जब कोई अमेरिकी राष्ट्रपति सारे नियम-कायदों को ताक पर रखकर किसी अन्य देश के सम्मान समारोह मे शामिल होता है। उधर हिलेरी क्लिंटन द्वारा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद मे भारत की दावेदारी को समर्थन देने की बात कहना ये संकेत ज़रूर कर रहा है कि ये महज़ "Lip Service" नही है और लगता भी है कि नये वादों के जाल मे आने वाले वक्त का कुछ हला-भला करने की कोशिश तो जरूर हो रही है?

Tuesday, 25 May 2010

ज़रूरत है..ज़रूरत है..ज़रूरत है..


सियासी अफ़रा-तफ़री अब अपने यौवनकाल मे है..छोड़ो कल की बातें, कल की रूत थी पुरानी..कुछ इसी तरह की न्यूली राजनीति के शोमैन बने हैं देश की सियासी मिट्टी के मनमौजी मेनस्ट्रीम के नेता।एक तरफ़ झारखण्ड के झगड़े की वजह से प्रांत के लोग और विकास अब क़िस्से कहानी हो गये हैं तो दूसरी तरफ मायावती जो कि .प्र की मैडम बनी बैठी हैं, खुद ये ऐलान करने मे फ़क्र से फूली जा रही हैं कि उन्होने जो करोड़ो रूपयों का क़िला खड़ा किया है वो सब जनता के चंदो का कमाल है। ख़ैर इनसब पर बहस करके पूरा न्याय करेंगे लेकिन एक और तमाशे को अपनी टोकरी मे शामिल कर लें फिर बात बनेगी..समाजवादी पार्टी ने भी कम नौटंकी नही की है हाल फ़िलहाल..पहले जयाबच्चन को राज्यसभा का टिकट देकर अमर सिंह को उन्ही के अन्दाज़ मे जवाब दिया फिर पता नही जया भाभी को कौन से ज़रूरी काम याद गये के उन्होने टिकट लेने से इन्कार कर दिया..अमर गदगद हो गये और सपा के साहब मुलायम को मलाल रह गया कि वो एक मौका चूक गये अमर को असरदार तरीक़े से रिप्लाई देने मे..दरअसल मुलायम सिंह को ये बात निगली ही नही जाती कि बच्चन कुनबे का पिकनिक होम अमर सिंह के आसपास भी हो।इसलिए इस बार भी जया को अपनी जमात मे शामिल करके अमर सिंह के माथे पर शिकन की अनगिनत लक़ीरें देखने के ख्वाहिशमंद थे पर अफ़सोस पलक झपकते ही उनकी ये इच्छा ख़्वाब हो गई..वैसे जहां सपा जया मैडम की वजह से सुर्ख़ियों मे रही तो वहीं उ.प्र. की एक और पार्टी है जो हमेशा की तरह इस बार भी सिर्फ़ और सिर्फ़ अपनी मैडम मायावती के कारण फ़ोकसियाए जा रही है..इस बार बसपा की बाप बनी मायावती दलित की बेटी से दौलत की देवी बनने का ऐलान कर चुकी हैं..बहनजी ने विधान परिषद के नामांकन दाख़िले के मौके पर जो हलफ़नामा पेश किया उसमे उनकी चल-अचल संपत्ति की हद 88 करोड़ की लाईन को पार कर चैंपियन बन बन गई है..सबसे लाजवाब बात तो ये है कि माया मैडम एक मंच से अपने बोलवचनो में कहतीं है कि पैसों का ये पैलेस जनता के चंदों की वजह से है।वो सिर्फ़ यहीं नहीं रूकतीं, कहती हैं कि इतना पैसा इसलिए इकट्ठा किया है ताकि देश की अन्य दौलती पार्टी से मुक़ाबला कर सकें..वाह जी वाह, कोई मैडम को ये क्यूं नही बताता कि आजकल की सियासत के लिए दौलत एक ज़रूरी शर्त बेशक़ है लेकिन यहां उस दौलत का इस्तेमाल आपकी सियासी गाड़ी के ईंधन के रूप मे कम और स्वयं के ऐश-ओ-आराम के साज़ो-सामान मे ज़्यादा हो रहा है। ख़ैर देवता हमेशा गुरूर को सिर कुचल देते हैं इसलिए विश्वास है कि ये ज़रूरत की सियासत एक ना एक दिन इन सारे बेईमान खिलाड़ियों को एक मजबूर मज़दूर बनाके ही छोड़ेगी।

Monday, 17 May 2010

फ़िक्र कीजिए..धुंए में मत उडाईए!!



सिमटी-सिमटाई ज़िन्दगी में खुद की ख्वाहिशों में उलझने के सिवा और कोई शगल हमें रास नही आता रात-दिन सिर्फ और सिर्फ हम सब इस धरती और आसमान को लूटने के फेर में हैं और ये भी बर्दाश्त नही कि कोई हमें डकैत कहे दरअसल ये कमीनापन अब हमारी फ़ितरत का हिस्सा बन चुका है, तभी तो साफ़गोई से अपनी बात कहना या तो हम भूल गए हैं या तो हमारे अन्दर वो साहस ही नही है कि सच कह सके ऐसा नही है कि चीज़ों को हम समझ नही रहे, बस हर बात का इल्म होते हुए भी चुप रहना हमने पहले सीखा और अब ये नाजायज़ सलीका आदत के साथ गलबहियां डाले मज़े से हमारे साथ लिव-इन रिश्ता निभा रहा है मेरी इस तरह की बातें शायद ये इशारा कर रही हों कि मै आशावादी नही हूँ या फिर ये भी तो हो सकता है कि मै जो कुछ कह रहा हूँ वो एक ऐसा साफ़ सच हो जिससे इत्तेफ़ाक़ ज्यादा लोग इसलिए ही रखेंगे क्यूंकि ऐसी सही बात लोगों को नागवार ही गुज़री है खैर दोनों बातें हो सकती हैं मन्ना डे की आवाज़ में गाया हुआ बेहद खूबसूरत गीत है "नदिया चले, चले ये धारा..तुझको चलना होगा"..गीत का ज़िक्र इसलिए किया क्यूंकि ये आशावादी है और हर हाल में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता और..आगे बढ़ना ज़रूरी है लेकिन किसी को पीछे धकेल कर नही.यही एक बात नही, अपनों से स्यापा करने की होड़ वाली दौड़ में भी हम परिवार और मूल्यों की दुनिया का मखौल उड़ाने में मसरूफ़ हैं..हाल के कुछ वर्षों में भारत अपनी वो पहचान धुंधलाता जा रहा है जिसकी वजह से उसे विश्व गुरु की संज्ञा दी जाती है और ताज्जुब कि बात ये है कि अपने संस्कारों और मूल्यों की कीमत पर खुद के ग्लोबल हुए जाने पर हमें फ़क्र है, शायद हम इसलिए खुश हैं क्यूंकि इस उजाले के पीछे ना ख़त्म होने वाले अँधेरे से अभी हमारा तार्रुफ़ नही हुआ हैकोई बात नही, अगर इतना ही इतराना है अपने ग्लोबलिया बनने पर तो शौक से अपनी values को कोई value मत दीजिए और मौजा नी मौजा करिए..लेकिन याद रहे आने वाले वक़्त में मूल्यों की चिता की राख़ से आपका ग्लोबल चेहरा काला हो जायेगा और तब ये शिकायत मत करियेगा कि राहें धुल उड़ाती चली गयीं और आप मटियामेट हो गए।


तस्वीर साभार-The Wall Street Journal.

Tuesday, 20 April 2010

इंडियन पैसा लीग !!


हंगामा है क्यूँ बरपा..थोड़ी सी जो पी ली है..डाका तो नही डाला..चोरी तो नही की है, लेकिन इंडियन प्रीमियर लीग उर्फ़ इंडियन पैसा लीग उर्फ़ इंडियन पोलिटिकल लीग में हंगामा भी है, पीने-पिलाने को शराब भी और चोरी-डकैती की तो बात छोड़ ही दीजिए साहब..करोड़ो के इस बेहिसाब कारोबार में हालिया दौर में पैसे के लिए वो सब कुछ हो रहा है, जो होगा इसकी आशंका तो हमेशा से थी लेकिन इस तमाशाई अंदाज़ से होगी ऐसी आस तो कम से कम नही थी। दरअसल आईपीएल का जन्म ही पैसे और शोहरत के लिए हुआ..खेल की बात इसके अब तक के सफ़र में कहीं हुई ही नही। करोड़ो के इस वारे-न्यारे वाले व्यापार ने क्रिकेट को बाज़ार में लाकर खड़ा कर दिया है, खिलाड़ी बिक रहे हैं और खेलप्रेमियों के लिए भी ये सब कुछ मनोरंजन से ज्यादा कुछ नही रह गया है..और फिर चाहे ये एंटरटेनमेंट मैदान पर हो या उसके बाहर? इन सबसे अलग ग्राउंड और उसके बाहर दोनों ही जगहों पर चल रहे खेल में एक बात पर गज़ब का संयोग है और वो ये की दोनों के ही माहिर खिलाड़ी पैसे के लिए अपना गेम खेल रहे हैं, हाँ ये बात अलग है कि मैदान के बाहर के योद्धाओं के लिए कोई नियम-कायदे नही हैं। शायद यही वजह है कि ये चालू खिलाड़ी बेरोकटोक अपने पैंतरों की आज़माइश कर दोनों हाथों से पैसा समेटने में बिज़ी हैं। लेकिन जब भी इन्सान के ख्वाहिशों की बेइंतहाई बढ़ जाती है तो वो सबकुछ बटोरने के फेरे में बौखला जाता है और आजकल आईपीएल के इन गैम्बलर्स के साथ भी ऐसा ही कुछ हो रहा है। एक साल पहले तक आईपीएल के "पा" यानि ललित मोदी साउथ अफ्रीका में आईपीएल के सफल आयोजन को लेकर मीडिया से लगाय क्रिकेट के काबिलों से बधाई लेने मे व्यस्त थे, वैसे मोदी साहब व्यस्त आज भी हैं लेकिन इस बार फर्क बस इतना है कि इस बार क़ी मसरूफ़ियत मीडिया के सवालों के जवाब ढूँढने में ज्यादा है। ये सारा मंज़र बयां कर रहा है कि आईपीएल की पैदाईश से लेकर अबतक के इसके flawless सफ़र में पैसों की फ़सल उगाने की ही खेती की जा रही थी, ज़ाहिर है रूपयों की रियासत को खड़ा करने में सत्ता के साहबों का भी दोस्ताना ज़रूरी रहा होगा और हुआ भी ऐसा, इसलिए कहीं कोई ब्रेकर नही आया आईपीएल की राह में। साठगाँठ की सवारी आराम से चली जा रही थी लेकिन इसी बीच मोदी साहब से एक नादानी हो गयी और उन्होंने छेड़ दिया सत्ता में शामिल एक मधुमक्खी का छत्ता, यानि शशि थरूर के गुरूर को दे दी ललकार..वो थरूर जो अपने मन में कुछ नही रखते, सबकुछ उल्टी कर देते हैं "ट्विटर" पर..अब ख़ता हुई तो सज़ा भी बनती है ना?? सो भाईसाब शुरू हो गया एक नया खेला, मोदी,जिनका हिसाब-किताब लेने की फुर्सत आईपीएलके आगाज़ से लेकर अब तक नही थी उसपर शिकंजा कसा जाने लगा। आयकर विभाग से लेकर बीसीसीआई सभी लंगोट बांध कर मोदी को धोबी पछाड़ देने में लग गए और नौबत अब यहाँ तक आ गयी है कि दबी जुबान में कहा जाने लगा है कि मोदी को आईपीएल कमिशनर के पद को टाटा-बाय-बाय कहना पड़ सकता है। उधर बेचारे थरूर साहब को सरकार ने भरसक बचाने का प्रयास किया लेकिन विपक्ष ने ऐसा ना होने देने की ठान ली थी तो थरूर साहब भी अपना सामान समेट के चल दिए। बहरहाल तीन सालों में आईपीएल और खुद को पैसे और शोहरत से लबालब करने वाले फ्रेम के ये बाहर वाले खिलाड़ी आजकल मेनफ्रेम में हैं ज़रूर लेकिन उन वजहों से जिनसे ये कुख्यात ही ज्यादा हुए हैं। उम्मीद तो नही फिर भी करेंगे कि इन सारे सलूकों से सबक लेकर पैसा भुलाकर सिर्फ खेल होगा और वो भी मैदान पर..ना कि उसके बाहर..आमीन!!

सरकने का ये दौर..सिसकियों का ये ज़माना..

AI generated Image from ChatGPT सरकने का ये दौर..सिसकियों का ये ज़माना.. बुझा हुआ आसमां..कच्ची दीवारों का अफ़साना.. ठोकरों से भरी राहें...रास्...