Monday, 17 May 2010

फ़िक्र कीजिए..धुंए में मत उडाईए!!



सिमटी-सिमटाई ज़िन्दगी में खुद की ख्वाहिशों में उलझने के सिवा और कोई शगल हमें रास नही आता रात-दिन सिर्फ और सिर्फ हम सब इस धरती और आसमान को लूटने के फेर में हैं और ये भी बर्दाश्त नही कि कोई हमें डकैत कहे दरअसल ये कमीनापन अब हमारी फ़ितरत का हिस्सा बन चुका है, तभी तो साफ़गोई से अपनी बात कहना या तो हम भूल गए हैं या तो हमारे अन्दर वो साहस ही नही है कि सच कह सके ऐसा नही है कि चीज़ों को हम समझ नही रहे, बस हर बात का इल्म होते हुए भी चुप रहना हमने पहले सीखा और अब ये नाजायज़ सलीका आदत के साथ गलबहियां डाले मज़े से हमारे साथ लिव-इन रिश्ता निभा रहा है मेरी इस तरह की बातें शायद ये इशारा कर रही हों कि मै आशावादी नही हूँ या फिर ये भी तो हो सकता है कि मै जो कुछ कह रहा हूँ वो एक ऐसा साफ़ सच हो जिससे इत्तेफ़ाक़ ज्यादा लोग इसलिए ही रखेंगे क्यूंकि ऐसी सही बात लोगों को नागवार ही गुज़री है खैर दोनों बातें हो सकती हैं मन्ना डे की आवाज़ में गाया हुआ बेहद खूबसूरत गीत है "नदिया चले, चले ये धारा..तुझको चलना होगा"..गीत का ज़िक्र इसलिए किया क्यूंकि ये आशावादी है और हर हाल में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता और..आगे बढ़ना ज़रूरी है लेकिन किसी को पीछे धकेल कर नही.यही एक बात नही, अपनों से स्यापा करने की होड़ वाली दौड़ में भी हम परिवार और मूल्यों की दुनिया का मखौल उड़ाने में मसरूफ़ हैं..हाल के कुछ वर्षों में भारत अपनी वो पहचान धुंधलाता जा रहा है जिसकी वजह से उसे विश्व गुरु की संज्ञा दी जाती है और ताज्जुब कि बात ये है कि अपने संस्कारों और मूल्यों की कीमत पर खुद के ग्लोबल हुए जाने पर हमें फ़क्र है, शायद हम इसलिए खुश हैं क्यूंकि इस उजाले के पीछे ना ख़त्म होने वाले अँधेरे से अभी हमारा तार्रुफ़ नही हुआ हैकोई बात नही, अगर इतना ही इतराना है अपने ग्लोबलिया बनने पर तो शौक से अपनी values को कोई value मत दीजिए और मौजा नी मौजा करिए..लेकिन याद रहे आने वाले वक़्त में मूल्यों की चिता की राख़ से आपका ग्लोबल चेहरा काला हो जायेगा और तब ये शिकायत मत करियेगा कि राहें धुल उड़ाती चली गयीं और आप मटियामेट हो गए।


तस्वीर साभार-The Wall Street Journal.

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