Sunday, 27 June 2010

तेरे बिन...

दिन गुज़र रहे हैं तेरे बिन..

हाल भी ढल गया है तेरे बिन..

महसूस कुछ नही होता तेरे बिन..

पानी भी उँगलियों से फिसल गया तेरे बिन..

देवता हुआ जा रहा हूँ तेरे बिन...

पूजा हर ठहर जा रहा हूँ तेरे बिन..

रेशमी रातों की याद अब भी है तेरे बिन..

ख्यालों की बेवफाई की आज आस है तेरे बिन...

आख़िर सुकून होके भी नही है तेरे बिन..

4 comments:

  1. बहुत ही सुंदर कविता।

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  2. आखिर सुकून होके भी नहीं है तेरे बिन..कविता कहानी बयां कर रही है..

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  3. आपने तो नब्ज़ पकड़ ली अमृत भाई..

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  4. bahut khoob likha hai aapne, sach much lawab hai.....aur sabse jada behtar to aapke blog ka naam hai, "ye bhoj mere man se utar kyn nahi jata" Kabeele tareef

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