आतंकवादी हमले:आख़िर ऐसी बेबसी क्यों??
हमले के बाद शोक में डूबा दिन बीत जाएगा, हमला किसने किया..इस सवाल की छटपटाहट भी ख़त्म हो जायेगी और आतंकवादी हमलों के मकड़जाल के शब्दकोश मे अहमदाबाद, जयपुर और दिल्ली के बाद मुंबई का नाम भी जुड़ जायेगा॥हम भी जल्द ही सामान्य स्थिति में लौट आयेंगे॥फिर कल कोई और दिन होगा, कोई और शहर॥और ज्यादा देह के चीथड़े...और टी।वी। के परदे पर दहशत का एक और द्रृश्य...यहां सवाल ये नही है कि आतंकवादी हमले होने के बाद अगर अफ़सोस और धैर्य का नपातुला मरहम न लगाया जाय तो आख़िर किया क्या जाय? दरअसल यहां सवाल इस बात का है कि क्यों भारत आतंकवादियों की पसंदीदा सैरगाह बनता जा रहा है?? हिन्दुस्तान के ख़ूबसूरत शहरों के चेहरों पर पड़े ख़ून के छींटे इस बात के स्मरण पत्र की तरह हैं भारत आतंकी हमलों की जद मे है और हर हमले के बीच का अंतराल एक धोखे की तरह है।समझ मे ये नही आता कि आख़िर भारत ये स्वीकारने मे अपने क़दमों को पीछे क्यों कर ले रहा कि आतंकवाद से पीड़ित नाज़ुक देशों में से एक वो भी है।

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