Friday, 11 October 2013

विमल चंद्र पाण्डेय की कहानी “डर” और मेरी बात


आप जो चाहते हैं वो उस ओर धीरे धीरे बढ़ते हैं और मेरे लिए विमल जी की कहानियां, कविताएं और उनसे मिलने पर मिली बातें सब कुछ सबसे मेरे कुछ सीखने की राह में वो रौशनी हैं जिससे मुझे आगे बढ़ते रहने में डर नहीं लगता और ग़ौर करने वाली बात ये है कि उनका पहला कहानी संग्रह डर शीर्षक से है जिसकी हर कहानी से मेरा रिश्ता बन रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे सब मेरी कहानियां हैं। और शायद आप सबने जिन्होंने ये कहानियां पढ़ी हैं उन्हें भी ऐसा ही लगा होगा। दरअसल किसी भी रचनाकार की पहली कृति बहुत खास होती है और इस लिहाज से विमल जी ने भी इस कहानी संग्रह के ज़रिए कुछ ऐसे लम्हों का निवेदन हमतक पहुंचाया है जिनसे हमारा दुआ-सलाम हुए भी ज़माना हो गया।
   डर की पहली कहानी है रंगमंच...बहुत साधारण सी कहानी जिसे कहने का सलीका इसे आत्मीय बना देता है। ऐसा लगता है कि नायक की तरह आप भी उस वातावरण में घूम रहे हैं जहां वो सबसे ज्यादा खुश है आज के दिन पर क्योंकि उसने बड़े जतन से सौ रूपये जुटाए हैं नसीरूद्दीन शाह का अभिनय देखने के लिए..लेकिन तभी एक बतकही से बात निकलती है, ये दुनिया एक रंगमंच है और हम सब इस रंगमंच की कठपुतलियां, टिकट नहीं पास से एंट्री है और जिन्हे मिलने थे पास उन्हे मिल गये...ऐसे ही बहुत सी चीज़े जिनको मिलनी होती हैं मिल जाती हैं और जो शिद्दत से चाहते हैं उन्हें बस ऐसे ही खरे खरे जवाब मिलते हैं....चलो फिर पास भी गर मिल गया तो सौ रूपये गये जिनकी अहमियत तो वही जान सकता है जिसे सौ रूपये के हर हिस्से में आगे के चार-पांच दिन का गुज़ारा ललचाता हो..लेकिन सब बरदाश्त है क्योंकि भूख प्यास तो हर रोज़ लगेगी मगर नसीर रोज़ नसीब में ना होगा और फिर ये कहानी आखिर तक आते आते नसीर वाया नसीब एक नज़ीर बन जाती है जहां हम सब तो सच में इस दुनियाई रंगमंच की कठपुतलियां हैं।  
   दूसरी कहानी है..स्वेटर..जो किसी जादू की तरह है..मतलब ये प्रेडिक्टबल है किसी जादूगर के मायाजाल की तरह मगर विमल आपको उन्ही भावनाओं का अमृत पिला रहे हैं जिसकी सबसे ज्यादा प्यास आपको लगी है। एक घर का होनहार लड़का ऑस्ट्रेलिया जा रहा है जिसकी फ्लाइट का वक्त करीब है, मां-पापा दोस्त यार सब उसके इस विदाई के वक्त में साथ हैं और सबकी अपनी निजी तैयारिया हैं लेकिन एक और है जो एयरपोर्ट पर आने वाली है जो बुन रही है उसके लिए स्वेटर और मेलबर्न में ठंड बहुत पड़ती है इसलिए पिता ने नेपाल से लाये स्वेटर के साथ जैकेट भी पहना दिया है लाडले को..मगर पिता को एयरपोर्ट ना चलने के लिए राज़ी कर ले तो उस लड़की से अपने ढंग से मिल लेगा,ये लड़किया हम सब की ज़िंदगी में अचानक से खास बन जाती है..और सर्दी आज कम भी है तो पिता का दिया स्वेटर जानबूझकर भूल जाना अच्छा है। मगर पिता जिन्हे डॉक्टर ने दौड़ने भागने को डॉक्टर ने मना किया है वही दौड़ते आकर वो स्वेटर थमाते हैं- अरे तुम ये स्वेटर भूल आये थे तकिये के नीचे...और मेरी पसंदीदा लाइन...हम सबके पिता सबसे ज्यादा उसी चीज़ को उपलब्ध दिखाने की कोशिश करते हैं जिसकी सबसे ज्यादा कमी हो उनके पास..और हमारा जो सारा विद्रोह है वो अपने पिता से है क्योंकि इक वही हैं जो हमारी सारी खिलाफ़त का लिहाफ़ रखे हमारे ही बारे में सोचते रहते हैं। ये कहानी इस वक्त मेरे दिल के सबसे करीब रह गई है।
कहानी का तीसरा शीर्षक ग़ज़ब है..मन्नन राय ग़ज़ब आदमी हैं...जी हां यही टाइटिल है विमल की तीसरी कहानी का..ये कहानी मन्नन राय के बहाने न केवल बनारस जैसे पुराने शहर के बदलते मिज़ाज पर व्यंग्य करती है बल्कि इसके मार्फत विमल पूरे देश में बदलाव के ताप का मूल्यांकन करते हैं। एक जगह वो लिखते भी हैं, बच्चे जल्दी जल्दी किशोर, किशोर बड़ी तेज़ी से युवा और युवा बड़ी तेज़ी से अवसादग्रस्त हो रहे थे। हर बात के लिए औसत आयु कम हो रही थी..चाहे बूढ़ों के मरने की बात हो या लड़कियों के ऋतुचक्र के शुरूआत की।इस व्यंग्य में विमल ने कई पीढ़ियों में प्रभावशाली व्यक्तित्व वाले मन्नन राय को आधार बनाकर बदलते वक्त में वृद्धों की मौजूदा हालत पर ध्यान दिलाया है...और उनकी बात को उधार लेते ये मानना पड़ेगा सच में कि हर मन्नन राय बुढ़ापे में ज्यादा दिनों तक तना रहने नहीं दिया जाता।
चश्मे ये कहानी की किवाड़ का चौथा हिस्सा है जिसमें एक पिता अपने बेटे का छोड़ा हुआ वो चश्मा लगा रहा है जिसके लिए उसने कभी बेटे को डांटा था, परिवर्तन संसार का नियम है लेकिन ये उनपर ज्यादा फबता है जो लचकदार है और झट से बदल जाना वक्त के हिसाब वाली कोई बासी बात बनाकर कहते हैं। लेकिन वो पिता जो कभी चट्टान था और परिवार में तानाशाह था वो अचानक मोम बन जाये तो....विमल एक चश्मे को व्यवहार में शामिल कराकर एक ऐसी बात कह जाते हैं इस कहानी में जो कही कैसे जाय ये भी पेचीदा काम है।
पांचवी कहानी डर जो की इस संग्रह की शीर्षक कहानी भी है एक गंवई लड़की के बारे में जो मां के मर जाने के बाद अपने पिता के साथ है, वो गांव की लड़की है मगर चूहों, तिलचट्टों के साथ-साथ कब्रिस्तान के हाजी बाबा से डरती है मगर पिता कहता है कि उसे कम से कम चूहों और तिलचट्टों से नहीं डरना चाहिए क्योंकि ये सब शहरी लड़कियों पर शोभा देते हैं, इस कहानी मे एक सीन है जहां बाप को खून की उल्टियां होने पर लड़की को मजबूरन डॉक्टर के घर जाना है जो कब्रिस्तान के रास्ते के पार है, इसी कब्रिस्तान में हाजी बाबा की कब्र भी है जो लड़की का डर भी है। वहम, भ्रम और बारिश उसे एक वहशी शराबी के का शिकार बनाते हैं मगर उसके अनदेखे डर से ज्यादा खतरनाक ये दिखने वाला डर है। कैसे हमारा भय हमेशा हावी हो जाता है हम पर और कैसे किसी एक घटना से वो काफूर भी हो जाता है, विमल की ये कहानी प्रतीकात्मक रूप में सब परोस कर रख देती है। 
सोमनाथ का टाइम टेबल ये मेरी सबसे पसंदीदा कहानी इसलिए भी बन पायी क्योंकि इसको पढ़ते वक्त ज़बरदस्त दृश्य रचना करते चलते हैं आप मतलब इतना क्षमता है इस कहानी में कि शुरू से आखिर तक इसमें हास्य, रोमांच, एक्शन, प्रेम और संदेश सब मिलता है। इसके बारे में ज्यादा लिख भी नहीं सकता और यही कहूंगा कि ज़रूर पढ़िये..
सातवीं कहानी है सिगरेट..वैसे तो मुझे नशे से नफरत है लेकिन इस सिगरेट को पता नहीं क्यों मुझे भी अपने हाथों में संभाले रखना अच्छा लगा। विमल की ये कहानी भी प्रतीकात्मक रूप में दोस्ती की अलहदा कहानी के साथ साथ हमारे जीवन जीने के उन महत्वपूर्ण आधारों की तरफ ले जाती है जो ज़िंदगी के किसी भी क्षण बदलते नहीं हैं।
सिगरेट का बाद की कहानी है सफ़र...ये कहानी बताती है कि कैसे हम उन चीज़ों की तरफ ज्यादा परेशान रहते हैं जो हमारे लिए नहीं है लेकिन जो हमारी हैं वो महत्वपूर्ण नहीं है ऐसा भी नहीं है लेकिन वो अहमियत वाला वक्त किस रूप में और कौन से सफ़र से आपको दर्शन देगा ये आप नहीं जानते। ये कहानी बगैर किसी बड़ी फ़िलॉसफी के दिल तक उतर आती है।
किताब की नौंवी कहानी सबसे मज़बूत कहानी लगी मुझे एक शून्य शाश्वत जब शुरू होती है तो लगता है विमल कुछ वही कह रहे हैं जो बहुत सी कहानियों में हमने पाया है या कहीं ना कहीं किसी छाया के साथ ये कहानी चल रही है मगर ये बुनियाद भर इसलिए कॉमन लगती है क्योंकि कहानी हमारे बीच की है। कैसे हम वो बनना चाहते हैं जो बन नहीं सकते और कुछ सपने आई ड्रॉप की तरह आंखों में दाखिल कराने लगते हैं लेकिन देर सवेर नहीं बल्कि छोटे से वक्त में वो सपने आपकी आंखों की कोरों से बह निकलेंगे और फिर? क्या होगा जब आंखों की कटोरी में पुराने छोटे सपने भी बह निकलेंगे होगें दवा के साथ। ये कहानी जब आखरी मोड़ पर पहुंचती है तो चौंकाने लगती है, वैसे चौंकाते विमल कई बार हैं लेकिन इस कहानी में दर्शन भी है और फलसफा चौंकाये तो हैरत भी होती है और जब तक आप कहानी खत्म करते हैं तो गिरफ्तार कुछ ऐसे हो जाते हैं कि अगली कहानी को पढ़ने से इतर इसी कहानी की कोख में अपना शिशु तलाश रहे होते हैं।
उसके बादल और वह जो नहीं है ये दो कहानियां सत्य के आभासों पर केंद्रित हैं..वैसे तो एक ग़ज़ल है कि सच घटे या बढ़े तो सच ना रहे मगर यहां सत्य बढ़ घट कर भी सत्य ही है। इन दोनो कहानियों में सही और ग़लत वाली जिरह ही आधार है बस फर्क इतना है कि उसके बादल में बड़े जज़्बाती रिश्ते बुने गये हैं और पात्र भी तो वहां निर्णायक कहानी ही है जबकि वह जो नहीं है पूरी तरह से सही और ग़लत कुछ नहीं वाली अवधारणा को छूती हुई बगैर किसी ऊबाउ भाषण के व्यवहारिक छोटे से कथानक से आपको लाजवाब कर जाती है।


     कहानी का आखरी पाट है जैक जैक रूदाद-ए-नीरस प्रेम कहानी..ये कहानी में पहले भी पढ़ चुका हूं और सही मायनो में विमल जी से मेरी मित्रता की ये पहली कड़ी थी तब मैं उन्हें पहली बार उनकी इस कहानी के ज़रिए ही जान पाया था। चूंकि मैं भी मीडिया का मुलाज़िम था तो ये व्यंग्य मेरा फेवरेट बन गया। वैसे मैने कम पढ़ा है बहुत बड़े बड़े साहित्याकारों को लेकिन विमल उनसब में मेरे सबसे पसंदीदा हैं जिन्हे मैने अब तक पढ़ा है वो इसलिए भी क्योंकि मै जो भी लिख रहा हूं वो उनकी अगर स्टाइल कॉपी करना भी हो तो मुझे कोई दिक्कत नहीं। कोई दिन नागा नहीं जाता जब मैं उनसे सीखता नहीं। बहुत से लोग साहित्यकार हैं लेकिन विमल साहित्य के यार हैं और साहित्यकारों से ज़्यादा साहित्ययारों की ज़रूरत है, ऐसा मेरा निजी विचार है।

Wednesday, 18 September 2013

सपनों का एक थान लत्ता...

मैने ही ली है तस्वीर

सपनों का एक थान लत्ता..
तुम क्या उससे मेरा कफ़न सिलवाओगे..
देखो ये तुम्हारी औरत जो बात मान लेती है..
तो वो मानती चली जाती है...
दुनियाभर की औरतें ऐसे ही मानते हुए जीती हैं..
तुम पहले नहीं हो जो पगार पर पलेगा..
तुम्हे क्या राशन खरीदना पसंद नहीं..
तुम्हारी बीवी तुम्हारे बच्चों को होमवर्क करा रही होगी..
ये सोचकर तुम्हें तड़प मिलती होगी शायद..
तेरे सपने भनपना रहे हैं...
चल नालायक तू सपने देखता है..
दुत्कारा जाता है सपनों का आखेटक..
ख्वाब से रोटी नहीं..कौड़िया मिलती हैं..
जिनसे नहीं मिलती कोई साड़ी तेरी पत्नी की..
बिन इलायची की चाय ना पिला पाया मेहमान को तो सपने बे-औकात..
मुजरे देखने वाले भी तो पले थे किसी औरत के दूध पर..
रंडियां भी तो घूम रही है..तुम वैसा कुछ क्यों नहीं करते...
तुम्हे किसने कहा था कि गोवर्धन पर्वत उठा लो..
सुनो,,,नया पाप करके सब पुरानी गंगा ही नहातें हैं..


Thursday, 29 August 2013

गीली पट्टियां...

courtesy: Digital Art By Jaded4life
मैं सिरहाने बैठा था उसके..गीली पट्टियां लेकर..

बस इक यही बात उसे याद रह गई...

दरवाज़े जिन घरों के गुसलखाने में नहीं होते..

उस घर की औरते साड़ियों से परदा करती हैं...

मैने प्यार जताया होगा...तभी तो..

उसने मेरा दिया हुआ ब्रेसलेट कलाइयों में पहन के दिखाया था..

बहुत खुश थी उस दिन वो...

मगर मैं अब भी उसके सिरहाने बैठा था गीली पट्टियां लेकर..

मुझे भी बस इक यही बात याद ना रही...

कपड़ों से चरित्र नापा था एक ने ...

कईयों की आवाज़ में उसका तंज भी बाद में सुनाई देता था मुझे..

वो लड़की जो आपके हर झूठ को झेल कर बनी रहे आपके साथ,,,

उसके माथे पर गीली पट्टियां रखने को बैठना पड़ता है...

मैं कल शाम से बैठा हूं ये गीली पट्टियां लेकर..

इक ये बात सबको याद रह गई...

वो खुश हो जाया करती यूं ही..

किसी ने मेरी तारीफ में कहे थे दो चार शब्द..

और मैने दिये थे कोई सौ दो सौ दर्द...

महीनो गोदी में संभाल के रखा मेरी तारीफ को..

दर्द वाली बातों को घबराकर कहीं चुरा दिया था उसने..

बस ये उदारता उसकी मेरे पास रह गई..

मैं अभी भी बैठा हूं गीली पट्टियां लेकर..

याद रह जाता जब एक जन्मदिन आपको..

पुराना फोन नंबर जब दिमाग से उतरता नहीं...

किसी की आंखों का रंग जब यादों से हटता नहीं..

तब याद आता है किसी से मिलने का दिन आपको..

वो भरोसा जो वैसा भरोसा किसी ने किया नहीं...

ढूंढतें है आप उस भरोसे को दोस्तों हमदर्दो और अपने पिता में..

बस मां में वो भरोसा आपको ढूंढने का मन आता नहीं..

ट्रेन प्लैटफॉर्म पर उतनी तकलीफ़ के साथ कभी निकली ना थी..

काजल में घुले आंसुओं का वो किसी का सबसे बुरा दिन याद रह जाता है आपको.
आप जब नाम देते हैं बहुत प्यारे-प्यारे किसी को..

सिरहाने बैठकर बुखार से तपते माथे को जब आप डर और करूणा दोनों में छू रहे होते हैं..

किसी मॉल के बाहर जब किसी को संभालते हुए आप खुद डगमगा रहे होते हैं...

जब कहीं मन के किसी तहखाने में आप फूट-फूट कर रो रहे होते है..

तब फोन से छनकर आने वाली उस आवाज़ का गुमशुदा हो जाना याद रह जाता है आपको..

लेकिन गीली पट्टियां अभी भी आपके हाथ में हैं...

सिरहाने बैठे भी हुए हैं आप..

मगर उस बिस्तर से उठकर वो चला गया है...

बस इक यही बात आपको अब तक याद रह गई..

 -प्रशान्त "प्रखर" पाण्डेय

           

Wednesday, 28 September 2011

बनती..बहकती..संभलती सी..




ज़रा ज़रा सी बात पर घूंघट की ओट में छुप जाने वाली हया की मूरत आजकल बिंदास हो गयी है तो लोगों को मिर्ची लगने लगी है। बरसों से स्त्री के लिए सीमाएं बनाने वाले मर्द अब उसके खुलेपन पर अपनी बात आलोचनाओं की शक्ल में ना रखकर दो कौड़ी की फब्तियों के रूप में रखना ज़्यादा पसंद कर रहे हैं। हो सकता है कि मेरी उम्र और मेरा तजुर्बा स्त्रियों के विमर्श के क़ाबिल ना हो लेकिन उसके बावजूद मैं इस विषय पर अपना नज़रिया पेश करने से ख़ुद को ना रोक पाया।शुक्रिया ब्लॉग महोदय क्यूंकि यदि आप ना होते तो शायद मेरी बात को मंच ना मिलता।मेरा ऐसा मानना है कि उपभोक्तावादी समाज में स्त्री विमर्श बाज़ारू हो चुका है... ये बहस महज़ स्त्री चरित्र के इर्द गिर्द ही अपना रोना रोता है। खैर जो भी हो, मगर ना मेरी और ना ही मेरी समझ में किसी और की ये हैसियत या अधिकार है कि हम स्त्री के चरित्र का जजमेंट देखी सुनी बातों से करें। हां ये ज़रूर है कि हर पल बदल रही स्त्री को समझकर हम उसके इस परिवर्तन पर अपनी बात रख भर दें। दरअसल हुआ कुछ नहीं है सिर्फ महिलाएं थोड़ी बेबाक और बिंदास हो गई हैं। और बेबाकी के उसके इस नये शगल ने भले ही कुछ बुद्धजीवी मरदों को स्त्री पर शब्दों की उल्टी का मौका दे दिया हो लेकिन मेरी राय में ये हक़ क़तई नहीं दिया कि वो किसी निष्कर्ष तक पहुंच कर उसके जिन्दगी जीने के इस अंदाज़ पर अपना फ़तवा जारी कर दें। यक़ीन कीजिए मेरी इस बनती...बहकती...और फिर संभलती स्त्री से कोई खास हमदर्दी नहीं है और मैं भी इस बदलाव की आंधी के कई कणों को गलत मानता हूं। ये लेख मेरे संतुलित विश्वास की आवाज़ भर है जो शब्दों में तामीर होते ही शायद आपकी सोच को बदलने का माद्दा रखती है।

हम परिवर्तन की बात करते हैं और बदलाव को अक्सर एक सकारात्मक रूप में भी देखते हैं लेकिन जैसे ही कोई स्त्री, पुरूषों के अधिकारक्षेत्र में दखल देती है तो चुभन का एहसास पूरे मर्द समाज को होने लगता है। तल्ख और सच कहूं तो पहनावे को ही लें, तो रोज़ परंपरागत कपड़े पहनने वाली लड़की को अचानक पश्चिमी परिधानों में देख हर मोड़ पे ये जताते लोग मिल जायेंगे कि उसने ये गलत किया और समाज के सभ्य खांचे में ये फिट नहीं बैठता। आमतौर पे ऐसी शुरूआत परिवार से ही हो जाती है। अब मैं एक सवाल इस पुरूष समाज पर भी दागना चाहता हूं कि आखिर हमारे किसा पहनावे पर ऐसा पाबंदी क्यूं नहीं है ? सामाजिक सीमाओं में हमारे लिए ऐसे क़ायदे क्यूं नहीं हैं ? अगर स्त्रियों के पहनावे पर हमें आपत्ति है तो हमारे किसी पहनावे पर इस तरह के तेवर क्यों नहीं देखने को मिलते ? इसकी दो वजहें हो सकती हैं...पहला ,या तो हम संपूर्ण और श्रेष्ठ हैं...अगर ऐसा है तो हमें देवतातुल्य समझकर हमारी उपासना होनी चाहिए जोकि है नहीं। दूसरी बात जिसकी गुंजाईश मुझे समझ में आती है वो ये कि हमने अपने मुताबिक नियम बना लिए हैं जिसकी वजह से कभी हम ग़लत हो ही नहीं सकते। इस तरह अगर अपने आपको सामाजिक ताने बाने में परफ़ेक्ट सिद्ध करना है तो फिर तो हम पर कभी उंगली उठ ही नहीं सकती।इतिहास के इस मोड पर स्त्री की आजादी से हम सबको खतरा महसूस होने लगा है है। चाहे वह पुरूषवादी समाज हो या सरकार से लेकर बाजार,सभी तरह की शोषणकारी ताकते इस आजादी से डरती है, ये एक कटु सत्य है।इस व्यवस्था में मेरे हिसाब से स्त्री के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है वो0 अपने अनुकूल जीवन-ज्ञान-व्यवस्था का इजाद करें । लेकिन अपने अनुकूल नियमों को ज़ख्म की तरह सामाजिक पत्थर पर खोदने वाले हम पुरूषों को इतिहास की अनिवार्यता का आभास नही है।क्योंकि इतिहास अगर अवसर देता है और अवसर छीनता भी है। वह जिसको स्थापित करता है उसको उखाड़ता भी है। चेत जाईये वरना देर हो जायेगी, ये चेतावनी हिंदी के उन लेखकों के लिए ज्यादा है जो साहित्य की गंगा को अपनी जागीर समझकर औरतों को छिनाल शब्द से भी नवाज़ चुके हैं।

Monday, 20 June 2011

परेशां...

कुछ सांच को आंच आयी तो राख की कालिख मिट ना पाई,
शोर हुआ...सुकून के रहगुज़र परेशां हुए तब ये नौबत आयी...
सांवला..सोया पड़ा ज़ेहन चुप रहा तो तन्हाईयाँ चिल्ला उठीं...
सवाल करने लगीं..जवाब पढने लगीं..मन को छिलने लगीं...
पुछा..वो कौन सा वक़्त था जब ज़मीर को बदलने की ज़रूरत चली आयी...
जवाब कुछ सिल दिए थे मैंने ज़ुबां पर..आत्मा को कहीं ढँक छोड़ा था...
कहा..मेरी ग़ैरत बिकी नहीं..मेरा ज़मीर मृत भी नही..बेहोश भी मै नहीं...
फ़र्क रहा बस इतना...मुझे इरादों को झुठलाने की अदा नहीं आयी...
--प्रशान्त "प्रखर" पाण्डेय.

Thursday, 30 December 2010

सिफ़र..शून्य से फ़लक तक..


मॉल्स और एमएनसीज़ के इस शहर में आये हुए दो साल हो चुके हैं..हर रोज़ कुछ नया सीखा..देखा..जाना और समझने की राह पर रहा।सबसे ख़ास बात कि इस शहर के पास आपको देने के लिए बहुत कुछ है बशर्ते आप ख़्वाहिशमंद हों। अपने आस-पास नज़रें नचायेंगे तो ज़िन्दगी के कई क़रतबों से वास्ता होगा। सिफ़र..A Theatre Fest ज़िन्दगी का एक ऐसा ही प्रश्नवाचक सा सफ़र करा गया मुझे..बहुत से सवाल जिनके जवाब ढूंढने की हम कोशिश भी नही करते वैसे सवालों से साक्षात्कार करा गया सिफ़र..इन मेट्रोपॉलिटन शहरों में जहां बादल सुलगता जा रहा हो..और ज़मीन के रूप में नंगी सड़क बेआबरू सी पड़ी मिलती हो वहां सच्चाई और यथार्थ का अभिनय ही सही बड़ा सुकून देता है। सूरते हाल की अदा पेश करता सिफ़र था तो महज़ तीन दिन का लेकिन ये सफ़र आंखों..मन..दिल और दिमाग के कुछ पुराने बंद किवाड़ों को खोल गया..कला..लोकसंस्कृति..लोग..भाषा, ये सबकुछ हमेशा से मेरे मन में कौतुक के अनगिनत भाव उत्पन्न करते आये हैं और ये भाव मेरे मन मे इतने अंदर तक पैठ बना चुके थे कि ख़ुद की ज़िन्दगी बनाने..संवारने की क़वायद में उलझा हुआ होते हुए भी नज़रें आस-पास इन कला के रंगों की ताक में तरस कर रह जातीं। शुक्रिया सिफ़र मेरे मन के इस बछड़े की प्यास मिटाने के लिए।मेरे पसंदीदा अदाकार और उससे भी कहीं ज़्यादा क़ाबिल निर्देशक और हिन्दी सिनेमा के शोमैन राजकपूर कहा करते थे कि उनकी फ़िल्में उनके बच्चे की तरह हैं और हिट फ़िल्मों से ज़्यादा वो अपने नाकाम सिनेमा को चाहते थे..इसका तर्क भी लाजवाब होता कि जो ठीक है वो तो ख़ुद-ब-ख़ुद सहारा पा लेगा मगर जो बच्चा अपाहिज है वो उनके दिल के क़रीब है। मतलब क़ामयाब फ़िल्में तो प्रसिद्धि पा लेंगी लेकिन फ़्लॉप पिक्चर का क्या? वो सिनेमा को तस्वीर कहा करते थे। ज़िक्र इस बात का इसलिए किया क्योंकि सिफ़र ने भी तीन दिनों के अपने अलग-अलग अफ़सानों में हर नाटक को बच्चे की तरह पेश किया। ये बच्चे सिर्फ़ और सिर्फ़ मज़े से ज़िन्दगी-ज़िन्दगी जैसा कोई खेल खेले जा रहे थे..हंसाते..गमज़दा करते..चिढ़ाते ये बच्चे कब आपकी उंगली थामे आपके साथ हो लेते इस बात का पता भी ना चलता..सच में नाटक ख़त्म होते ही क़िरदार आपके मन में एक ख़ास जगह बना लेते हैं..मुझे ये बात बहुत जंचती है कि तस्वीरों(नाटकों) के अपने-अपने करिश्में होते हैं वरना सोचिए कि चंद घंटों में पूरी की पूरी ज़िन्दगी का दीदार कैसे हो..मन कर रहा है कि सिफ़र की शान में ऐसे ही शब्द रंगता जाउं..सिफ़र से ये पहला वास्ता है इसलिए आलोचनाओं के लिए स्पेस नहीं दिखता..अगली बार जब आपके नाटकों से नया नाता बनेगा तब criticism की गुंजाईश बनेगी..लेकिन चाहुंगा सिफ़र ऐसे ही इस रास्ते पर और नये मील के पत्थर गाड़े ताकि हमजैसे मुसाफ़िरों को ज़िन्दगी का ये सफ़र, सिफ़र के एहसान सा लगे..जुनैद..अमित..फ़िरोज़ भाई..अतुल..रितुराज..राज..हरिनी और सिफ़र के तमाम सारथियों..आप सभी का शुक्रिया..इस सफ़र का साथ मेरे लिए कभी ना भूलने वाला है..नयी क़िताब की महक जैसा सिफ़र..चाय में डूबी बिस्किट के स्वाद जैसा..जाड़ों की सुबह की पहली ओस के चरित्र की तरह है सिफ़र..आगे भी रंगमच के इस साथ का इंतज़ार रहेगा..

Saturday, 9 October 2010

ज़मीन पर जानलेवा जोर...


जो अपनी मिट्टी से रूठ कर चला जाता है, उसका इंतज़ार वो ज़मीं भी करती है लेकिन जब बहुत वक्त तक वो वापस नही आता तो उसकी धरती भी उससे ख़फ़ा हो जाती है। ये माटी की नाराज़गी नहीं बल्कि उसके सब्र की टूटी हुई आस की प्रतिक्रिया भर होती है। किसान ज़मीन का बेटा है और जब कभी भी एक मां को उसके लाडले से अलग होना पड़ेगा तो कराह तो आयेगी ही । ये अलग बात है कि इस कराह को सियासी शोर मे दबाने के भरसक जतन किये जा रहे हैं लेकिन ये बेटे अपनी मां का आंचल छोड़ने को तैयार नहीं। ऐसे में हमारे पॉलिटिकल प्लेयर्स को अब ये बात समझ लेनी चाहिये कि किसानों को माटी के नाम पर मोहरा बनाकर सियासत करना जोखिम भरा शॉट हो सकता है। किसान आंदोलन पहले भी होते थे॥आज भी हो रहें हैं, फ़र्क बस इतना है कि पहले किसानों की बातों का महत्व होता ही नही था और आजकल बात तो सुनी जाती है लेकिन उसके बाद सरकार से लेकर मीडिया और बुद्धजीवी वर्ग सभी ऐसे मूवमेंट को ग़लत बताने मे लगे रहते हैं। ये सो कॉल्ड सरोकारी लोग दलील देते हैं कि जब-जब भी किसान ऐसे आंदोलन करते हैं तो आम जनता की डेली लाईफ़ मे खलल पड़ता है..बिल्कुल पड़ता होगा साहब लेकिन क्या इन्होंने ये सोचने की ज़हमत उठाई कि आख़िर क्या मजबूरियां आन पड़ती हैं कि एक किसान कच्ची राहों को छोड़ फ़ोरलेन पर बदहवास होकर चीखता है? ऐसे कौन से हालात हैं जो इस बावले को गांव का निश्चिंत गगन भूलकर शहर के जंगल मे आने को विवश करते हैं? जवाब किसी ने ढूढने की कोशिश नही की, सिर्फ़ सवाल गढ़ते गये। किसान आंदोलन होते रहे है..आज भी होते हैं और आगे भी छिड़ते रहेंगे..ये तब भी होते थे जब जागीरदार और ज़मींदार इनकी आवाज़ को दबाने का काम करते थे..ये अब भी होते हैं जब पूंजीपती और सियासी सांप मिलकर इन्हें डंसने पर आमादा हैं और तय है कि ये आने वाले कल मे भी होंगे जब औद्योगीकरण की ये सहमी-सहमी सी हवा गांवो को भी अपने बिगड़ैल माहौल का आदि बनाने लगेगी।देश के हर कोने को खोज-खोज कर किसानों की ज़मीनों को नज़र लगायी जा रही है, अब ऐसे मे अगर किसान की प्रतिक्रिया तीख़ी हो तो ये बिल्कुल सही है। यहां बताना चाहुंगा कि मेरा जन्म कुशीनगर मे हुआ और यही मेरा गांव भी है। सच कहुं तो काफ़ी वक़्त गांव मे रहने के बावजू़द भी कभी किसानों की पीड़ा समझ मे नहीं आयी..और जब शहर मे पढ़ाई करने और ख़ुद की पहचान क़ायम करने आया तो भी गांव के सुकून को देखकर ही टीस बढ़ती। हमेशा लगता कि हम शहरिया लोगों से ज़्यादा सुखी गांव के लोग हैं, मुझे लगता है आप मे से भी अधिकतर लोग मेरी ही तरह राय रखते होंगे।दरअसल गांवों और किसानों के बारे में हमारी ऐसी सोच इसलिए है क्यूंकि हम शहरों की भागदौड़ भरी प्रतियोगिता के प्रतिभागी है और वाजिब है जब इस रेस की तुलना ग्रामीण इलाक़ो और किसानों की ज़िंदगी से करेंगे तो सुख-चैन वहां ज़्यादा दिखेगा जहां अफ़रा-तफ़री नहीं है लेकिन मंद गुज़र रही इनकी ज़िदगी मे कुछ ना सुख इनका अपना है और ना ही चैन। हम सभी अपने हक़ के लिए हल्ला मचाते हैं उसी तरह किसान भी सिर्फ अपने अधिकारों के लिए बोलते है हालांकि ये गौर करने वाली बात हैं कि जबतक ये आवाज़ शोर या दर्द भरी चिल्लाहट मे नही बदल जाती तबतक उन कानों मे कुलबुलाहट नहीं होती जो इस दर्द के ज़िम्मेदार होते हैं। सफल-असफल किसान आंदोलनों के बीच आप इनके दर्द भरे अफ़साने खबरिया चैनलों और समाचार पत्रों के पन्नों मे बुने हुए पाते भी हैं। मुझे लगता है किसान आदतन बिगड़ा हुआ है, सूखे के शैतान और बाढ़ के बवाल के बीच ये हमेशा कॉम्प्रॉमाईसिंग भूमिका मे रहा है। फसल हो या ना हो लगान तो देना ही पड़ेगा ये पुराने ज़माने के ज़मीदारों के बोलनचन होते थे, आजकल सीन थोड़ा चेंज है..फ़सल इतनी बटोर ली गई है कि गोदामों मे पड़े-पड़े सड़ रही है और बाक़ी का लगान ज़मीन पर ज़ोर लगाकर अपने हक़ मे करने मे लग रहा है। यक़ीन जानिए जो चींज़ें किसानों की नियति के दामन मे डाल दी जाती हैं उनमे कुछ बदलता नहीं है, वो सारा कुछ वक़्त की नाव पर सवार होकर बोझ बना चला आता है। आज़ादी के पहले से किसान आंदोलन होते आये हैं और जब कभी भी ऐसे विरोधों को सरकार को सामना करना पड़ा तो समाधान ढूंढने की बजाय इन्हें कुचल देना ज़्यादा ठीक समझा गया। इस विषय पर मेरी समझ भले ही नाकाफ़ी हो लेकिन इतना ज़रूर है कि पीड़ा को समझने मे किसी उम्र या अनुभव की दरकार नहीं होती। इस संजीदा विषय पर लिखने की ज़िम्मेदारी से मै भली-भांति वाक़िफ़ हूं और लिखने का मन इसलिए हुआ क्यूंकि जब टप्पल मे किसानों पर बर्बरता हुई तो उसका असर देश के बाक़ी ग्रामीण और आदिवासी इलाक़ों के साथ मेरी जन्मभूमि कुशीनगर मे भी दिखा। ज़मीन अधिग्रहण की चीत्कार भगवान बुद्ध की इस शांत धरा मे भी सुनाई पड़ी। बता दूं कि यहां भगवान बुद्ध के नाम की बैसाखी लेकर दो हजार पांच सौ करोड़ रूपए की मैत्रेय परियोजना( एक अंतर्राष्ट्रीय परियोजना) का खाका १९९० में खींचा गया। कुशीनगर जो कि उत्तर-प्रदेश का एक ज़िला है और इससे ज़्यादा इसकी पहचान इस रूप में है कि यहां महात्मा बुद्ध ने अपने जीवन की अंतिम घड़ियां बितायी थीं और यहीं इनकी मृत्यु भी हुई। प्रोजेक्ट के मुताबिक यहां ५०० फ़ीट उंची मैत्रेय बुद्धा की कांस्य प्रतिमा बननी है, साथ ही एजुकेशन और हैल्थ के नज़रिए से भी इस विशेष इलाक़े को आबाद करना इस परियोजना के हिस्से में आता है। साथ ही इस इंटरनेशनल प्रोजेक्ट के लगे हाथों कुशीनगर में अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के निर्माण को भी ज़मीनी हक़ीक़त देने की योजना है। ज़ाहिर है इतने बड़े पैमाने पर जब परियोजना का दायरा हो तो ज़मीन की आवश्यकता तो होगी ही और कुशीनगर का ज़्यादातर हिस्सा खेती के उपयोग मे आता है, वो खेती जो किसान करते हैं और जिनकी ये ज़मीनें होती हैं। हालांकि इस बीच ख़बरें ऐसी भी आयीं कि मायावती सरकार ने पूर्वांचल मे किसान आंदोलन को बढ़ने देने से रोकने के लिए इस ज़िले के कुछ गांवों के किसानों की ज़मीन वापस करने का फ़ैसला किया है। ये ज़मीने हवाई अड्डे के विस्तार की योजना से अलग करके किसानों को वापस करने का आदेश हो गया है। साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार ने कुशीनगर में प्रस्तावित विवादास्पद मैत्री परियोजना को रद्द करने का भी संकेत दिया है। इस परियोजना से पीड़ित सैकड़ों किसान पिछले कुछ सालों से लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। माया मैडम ने चाहे डर के मारे ये क़दम उठाया हो या फिर पश्चिम में अलीगढ़ और आगरा के किसानों के आन्दोलन से सहम कर या किसी और दबाव मे, मगर राहत इस बात की है कि जो किसान अपनी जान देकर भी ज़मीन ना देने की बात कह रहे थे उनकी जान की कीमत उन्हें समझ में आई। उत्तर प्रदेश में ही नहीं बल्कि देश की पूरी चौहद्दी मे किसान औद्योगीकरण और विकास के नाते अपनी जान गंवाने पर मजबूर किए जा रहे हैं। ये सारे औद्योगीकरण के हिमायती लोग किसानों के हक़ के साथ उनकी जान लेने की तैयारी मे हैं। विकास के पॉपुलर खांचे में किसानों की बलि एक इनवेस्टमेंट बन गया है। हांलाकि किसानों के हितैषी बनने का दम भरने वाले और ख़ुद को तथाकथित किसान नेता कहलवाने का आलाप करने वाले मौकापरस्त नेता भी सत्ता के शहरों मे जाकर गांव मे कॉर्पोरेट खेती की वक़ालत करने लगते हैं। सिंगूर हो या नंदीग्राम, टप्पल हो या विदर्भ, हर तरफ पूंजीवादी साम्राज्यवाद की आंच पर किसानों की जान और ज़मीन का लहू पक रहा है। ये उपभोक्तावादी सभ्यता के साहूकार इस बात को समझना ही नहीं चाहते कि किसान को ज़मीन के बदले पैसा नहीं ज़मीन ही चाहिए। पैसे देकर क्या भला होगा? पैसों के तो पांच पैर होते हैं, आज नहीं तो कल ख़र्च होंगे ही, ऐसे में लाखों छोटे गांवो और क़स्बे के इस देश के किसानों की ख़िलाफत को समझिए, वो घाटे की खेती मे भी कम से कम जी तो रहा है, इसलिए कृपा करके ज़मीन पर ये जानलेवा जो़र बंद कीजिए।

सरकने का ये दौर..सिसकियों का ये ज़माना..

AI generated Image from ChatGPT सरकने का ये दौर..सिसकियों का ये ज़माना.. बुझा हुआ आसमां..कच्ची दीवारों का अफ़साना.. ठोकरों से भरी राहें...रास्...