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सरकने का ये दौर..सिसकियों का ये ज़माना..
बुझा हुआ आसमां..कच्ची दीवारों का अफ़साना..
ठोकरों से भरी राहें...रास्ते के पत्थर का अड़ जाना..
बढ़ते-घटते घर के हिस्से..हर हिस्से की छत से आंसू का बह जाना..आईने में झूठे चेहरे का समा जाना..शायद अक्स का छलिया नज़राना..
ज़माने का ये हाल ख़ुशमिज़ाज सही..मगर यक़ीन में सबका ग़मज़दा हो जाना..
उफ्फ़..बड़ा गज़ब है...सरकने का ये दौर..सिसकियों का ये ज़माना..
---प्रशान्त "प्रखर" पाण्डेय
Copyright Prashant Pandey (05/01/2025)
